देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।
दो क्षणिकाएँ
शब्द
कुछ शब्द चीख़ते हैं
कुछ कपड़े उतार कर
घुस जाते हैं इतिहास में
कुछ हो जाते हैं ख़ामोश
कविता
कविता दिन-भर थकान जैसी थी
और रात में नींद की तरह
सुबह पूछती हुई :
क्या तुमने खाना खाया रात को?
-मंगलेश डबराल
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