भाषा देश की एकता का प्रधान साधन है। - (आचार्य) चतुरसेन शास्त्री।

छोटे गीत

मेरा सब चलना व्यर्थ हुआ,
कुछ करने में न समर्थ हुआ,
मेरा जीवन साँसें खो कर,
पड़ गया आज निर्जन पथ पर,
उस श्रम का ऐसा अर्थ हुआ!


२)

अब प्राणों में बल शेष नहीं,
उर में आशा का लेश नहीं,
आँखों में आँसू भरे हुए,
चरणों पर किसलय झरे हुए,
सूनापन फैला सभी कहीं!

- चन्द्रकुँवर बर्त्वाल

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।