पत्रिका के पत्र... विशेष रूप से छोटी पत्रिका के पत्र मेरे लिए विशेष कौतूहल के विषय हैं। पत्रिका मैं न पढ़ूँ, पर ये पत्र अवश्य पढ़ता हूँ। इन विविध स्थानों, विविध व्यक्तियों के पत्रों की विविधता में जो एकता दिखाई देती है वह मेरे लिए विशेष आनंद का विषय है।
और मुख्य बात तो यह कि इनमें मैं अपने पत्र को खोजता हूँ। मैंने अब तक कोई सौ मे ऊपर पत्र लिखे हैं। अधिकांशतः छोटी पत्रिकाओं में। मैं इन पत्रिकाओं पर उन्हें खरीदकर या पढ़कर राय नहीं देता। एक बार उन्हें कहीं देख लेना और उन पर एक सरसरी निगाह फिरा लेना ही मेरे लिए काफी होता है।
खुद कोई पत्रिका मेरे पास आती है तो सुभानल्लाह। मैं उसे सिर चढ़ाए बगैर नहीं रहता। उसने मुझे बड़प्पन दिया, मैं उसे यह न दूं तो कृतघ्नता न होगी!
तार के जैसे कोड नंबर होते हैं उसी तरह इन पत्रिकाओं के पत्रों के भी कोड नंबर निर्धारित किए जा सकते हैं। पत्रों की विविधता में एकता के कारण यह संभव भी है। यहां कुछ कोड नंबर पेश हैं।
1. प्रवेशांक मिला। धन्यवाद और बधाई। पत्रिका दिन रात चौगनी उन्नति करे।
2. आपका चयन सराहनीय है अतः समस्त अंक पठनीय बन पड़ा है।
3. अंक देखा। आवरण आकर्षक है। सामग्री में विविधता है।
4. पत्रिका प्राप्त हुई। कविताएं रुचिकर एवं मार्मिक है।
5. पत्रिका अच्छी है। लेख गंभीर और तथ्यपरक हैं।
6. आपकी पत्रिका में गजले अच्छी खासी बन पड़ी हैं। बधाई।
7. प्रकाशन सराहनीय है। संपादकीय में आपके बेबाक विचार प्रभावित करते हैं।
8. पत्रिका की कहानियां संतोष देती हैं, कविताएं अच्छी हैं, लेख सराहनीय हैं।
9. पत्रिका के लिए बधाई। हमें ऐसे ही लघु पर ठोस प्रयत्न करने चाहिए ताकि प्रदूषित व्यावसायिक माहौल मे साहित्य को बचाया जा सके।
10.पत्रिकाओं की भीड़-भरी दुनिया में आपकी पत्रिका बीस है। मेरी शुभकामनाएं।
11.ऐसी सुन्दर, आंकर्षक, ज्ञानवर्धक पत्रिका के प्रकाशन हेतु आप बधाई के पात्र हैं।
12.सभी रचनाएं खूब पसंद आई। पत्रिका दीर्घजीवी हो।
13.वर्तमान स्थिति में एक लघु पत्रिका के प्रकाशन में आपने जो साहसिक कदम बढ़ाया है वह सराहनीय है।
14.पत्रिका देखी। सभी रचनाएं बहुत पसंद आईं।
15.विविध सामग्री भरा अंक मुझे पसंद आया। बधाई।
16.आपकी लगन, मेहनत और साहस की दाद देता हूं। पत्रिका अच्छी निकली है।
मैं अपने पत्रों में इन सोलह नमूनों का ही शब्दों के हेर फेर के साथ उपयोग करता हूँ। मेरे तो पत्र अब बड़ी पत्रिकाओं में भी ठाट से छपते हैं।
मेरा दोस्त राजाराम इन पत्रों के.... विशेष रूप से छोटी पत्रिकाओं के इन पत्रों के बड़ा खिलाफ है। वह कहता है कि यदि छोटी पत्रिकाओं को पत्र लिखे ही जाएं तो वे इस तरह के हों--
--यह पत्रिका है या मजाक है?
--महोदय, अपने फालतू पैसे का कुछ और अच्छा उपयोग कीजिए।
--संपादकजी, यह पत्रिका है या आपकी अपनी विज्ञापनबाजी?
--श्रीमानजी, आपके हाथ यह पत्रिका देखकर बचपन में जॉर्ज वाशिंग्टन के हाथ पड़ी कुल्हाड़ी की याद आ गई।
--साहित्य क्यों गिर रहा है उसके साक्ष्य रूप में आपकी पत्रिका उल्लेखनीय है।
--गुटबंदी का रोना रोने वाली और उसकी प्रतिक्रिया की उपज आपकी यह पत्रिका खासी गुटबंदी का शिकार है।
--महोदय, कार्य अवैर्तानक लिखने की जरूरत नहीं। आपको वेतन देगा कौन?
--आपका संपादकीय एकदम योजनाविहीन तथा उद्देश्यरहित है।
--संपादक जी अभिव्यक्ति स्वतंत्रता में विचाराभिव्यक्ति आती है कचराभिव्यक्ति नहीं।
राजाराम कहता है जिस दिन ऐसे पत्र लिखे जाएंगे.....न छपने वाले पत्र, उसी दिन गिरता साहित्य उठ सकेगा। छपने वाले झूठे पत्रों ने ही साहित्य का सत्यानाश किया है।
मैं राजाराम से महमत नहीं हूँ। और आज भी छपने वाले पत्र लिखता है।
-शंकर पुणतांबेकर
