व्यंग्य विधा है या नहीं, आज भले ही इस प्रश्न का बहुत हद तक समाधान हो चुका हो लेकिन व्यंग्य का संबंध, अधिक क्या सामान्यत: गद्य से ही बना हुआ है। कविता की बात आती है तो तय करना मुश्किल हो जाता है कि साहित्यिक परिवेश में तमाम व्यंग्य प्रधान कविताएं होने के बावजूद,व्यंग्य कविता, का अस्तित्व है भी कि नहीं।
व्यंग्य यात्रा के प्रवेशांक (अक्तूबर-दिसम्बर, 2004) में मेरी एक आहूत टिप्पणी प्रकाशित हुई थी- `संदर्भ कविता का, जिसमें मैंने लिखा था- “नयी कविता के जो दो प्रमुख आधार तत्व माने गए हैं वे नाटकीयता और व्यंग्य हैं। इन दोनों के बिना फ्री वर्स में लिखी जाने वाली कविता में चमक ही नहीं आती।”
बातचीत अथवा विचार-विमर्श में कविता में व्यंग्य की ही बात करने का चलन है। यूं भी जब हम व्यंग्य कविता कहने को उत्सुक होते हैं तो एक खास माहौल के कारण हास्य-व्यंग्य या हास्य-व्यंग्य की कविता के नाम से अधिक संबोधित करते हैं। व्यंग्य-विनोद भी कम ही कहा जाता है। और हम जानते हैं कि हास्य-व्यंग्य या हास्य-व्यंग्य की कविता को बुद्धिजीवी, मंचीय वस्तु, का नाम देते हुए अधिकतर साहित्य का हेय, चालू और अगम्भीर कर्म ही मान लिया करते हैं। डॉ. शेरजंग गर्ग ने भी अपने चर्चित शोध प्रबंध का शीर्षक,स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कविता में व्यंग्य, रखा है न कि ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी व्यंग्य कविता’।
एक बात और। गद्य में लिखे जा रहे व्यंग्य की लोकप्रियता और कुछ मूल्यांकन (जिसका श्रेय स्वयं व्यंग्यकारों को ही अधिक जाता है) की उपस्थिति के बावजूद व्यंग्य को विधा के रूप में मानने को लेकर जब तब दुविधा फन उठाती भी दिखती रही है। हरिशंकर परसाई ने व्यंग्य के विस्तृत दायरे को सब विधाओं को ओढ़ लेने में समर्थ मानते हुए उसे,स्ट्रक्चर, स्वीकार करने से इनकार किया है। उन्होंने तो व्यंग्य की उपस्थिति निबंध, कहानी, नाटक आदि सब विधाओं में मानी है। (मेरी श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाएं, लेखक की बात)।
ध्यान देने की यह बात भी है कि परसाई ने विधाओं की बात करते हुए कविता का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया। व्यंग्यकार रवीन्द्रनाथ त्यागी भी व्यंग्य को विधा नहीं मानते नजर आते हैं। लेकिन व्यंग्य को विधा मानने वालों में बाद की पीढ़ी के प्रेम जनमेजय जैसे प्रतिष्ठित व्यंग्यकार भी हैं जो प्रारम्भ से ही व्यंग्य को विधा ("मैं साक्षी हूँ", जून, 1975 में प्रकाशित,व्यंग्य एक और एक, पुस्तक के सह सम्पादक होने के नाते) न केवल मानते आ रहे हैं बल्कि उसे औरों से मनवाने में भी काफी हद तक सफल हो चुके हैं। सुरेश कांत की समझ है कि ‘व्यंग्य एक स्वतंत्र गद्य-विधा है, किन्तु वह शैली या स्पिरिट के रूप में अन्य विधाओं में व्याप्त होने की सामर्थ्य भी रखता है।’
स्पष्ट है कि औरों की तरह सुरेश कांत भी व्यंग्य को, विधा की दृष्टि से, पद्य या कविता से परे ही मानते प्रतीत होते हैं। अनेक विद्वानों ने निबंध साहित्य में व्यंग्य की जड़ मानी है। भारतेन्दु युग निबंधों का उद्गम युग माना गया है। अत: यह वास्तविकता है कि कविता या पद्य को अभी व्यंग्य को वह दर्जा मिलना है जो उसने गद्य से कमोबेश हासिल कर लिया है। खैर, विधा के प्रसंग में और अधिक डूबने की अनधिकृत चेष्टा करना खुद को ही व्यंग्य का शिकार बनाना हो जाएगा। अत: विराम।
इतिहास में जाएं तो पद्य या कविता में व्यंग्य की अच्छी उपस्थिति बहुत पहले से रही है। यहां तक कि आत्मव्यंग्य भी मिल जाएगा जिससे हिन्दी का गद्य व्यंग्यकार प्राय: बचता ही प्रतीत होता है। कविता में त्रिलोचन जैसे इने-गिने कवियों के यहां आत्मव्यंग्य भी देखा जा सकता है। मेरी इच्छा कविता में व्यंग्य के संदर्भ को अपने समय की कविता की आंख से देखने की होते हुए भी सबसे पहले बात मैं तुलसीदास पर लाना चाहूंगा। बालकाण्ड की निम्न प्राय: जानी-पहचानी अभिव्यक्तियों पर गौर किया जाए-
समरथ कहुँ नहिं दोष गोसाई। (68/4)
अर्थात समर्थ का कोई दोष नहीं माना जाता। इस अभिव्यक्ति का कटाक्ष और व्यंग्य के रूप में प्राय गलत-सही और बिना संदर्भ में गए प्रयोग होते हुए देखा गया होगा। मैंने स्वयं व्यंग्य यात्रा के प्रवेशांक में प्रकाशित ऊपर संकेतित अपनी टिप्पणी में इस कथन को नारद-प्रसंग से जोड़ने की भूल की थी। इसके विस्तार में जाने से पूर्व एक और अभिव्यक्ति उद्धत करता हूं-
पर संपदा सकहु नहिं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी। ।
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु॥ (135/4)
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारू।
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु॥ (136)
परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावई मनहि करहु तुम्ह सोई॥
भलेहु मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू॥ (136/1)
अर्थात तुम दूसरों की सम्पदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत हैं। समुद्र मथते समय तुमने शिवजी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया। असुरों को मदिरा और शिवजी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर (कौस्तुभ) मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा कपट का व्यवहार करते हो। तुम परम स्वतंत्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मन को भाता है, वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष-विषाद कुछ भी नहीं लाते।
यहां खीज और उलाहने से कटाक्ष और व्यंग्य तक की पदमय सशक्त यात्रा देखी जा सकती है। कोई भी यही आशय लेगा कि यहां किसी सत्ताधारी की अच्छी क्लास ले ली गई है। संदर्भ और प्रसंग से काट कर पढ़ेंगे तो ये पंक्तियां सचमुच कुटिल और हिटलराना प्रवृत्ति के सत्ताधारी के प्रति सशक्त और मारक व्यंग्य की अनुभूति ही देंगी। ऐसी अनुभूति के आनन्द के लिए थोड़ी देर को भूलना होगा कि इनके रचयिता भक्त तुलसीदास हैं।
आपको याद ही होगा कि,समरथ कहुँ नहिं दोष गोसाई, का संबंध मूलत: शिव से है जिसे उनके उमा के वर होने के संदर्भ में कहा गया है। शिव क्योंकि समर्थ हैं अत: उनके तथाकथित दोष गुण की श्रेणी में ही कहे जाएंगे। उसी प्रकार जैसे शेषनाग की शय्या पर सोने के बावजूद पण्डित विष्णु पर दोष नहीं लगाते, गंगा में शुभ-अशुभ जल जाने के बावजूद कोई उसे अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गंगा की भाँति समर्थ को कुछ दोष नहीं लगता। देखा जा सकता है कि जिस संदर्भ में उक्त पंक्ति को कहा गया वह पाठक को व्यंग्य की ओर जाने से रोकता है। लेकिन आज के, विशेष रूप से राजनीतिक और ब्यूरोक्रेसी के संदर्भ में यदि इसका अलग से उपयोग किया जाए तो यह एक सशक्त व्यंग्य का सृजन कर देगी।
अब हम अन्य पंक्तियों को लें जिनका संबंध नारद मोह-भंग से है। ये पंक्तियां विष्णु के कारण माया के वशीभूत हुए नारद के द्वारा विष्णु को क्रोध में कही गई हैं। ध्यान देना होगा कि यदि तुलसी की निगाह से देखेंगे तो दोष माया और क्रोध के खाते में ही डालना पड़ेगा, लेकिन वस्तु और उसके संदर्भ को हटाकर, अभिव्यक्ति के रूप में समझेंगे तो ये पंक्तियां आज के कुटिल और हिटलराना प्रवृत्ति के सत्ताधारी के प्रति सशक्त और मारक व्यंग्य की अनुभूति ही देंगी। कहा जा सकता है कि ये ऐसी पंक्तियां हैं जिनसे आज का व्यंग्यकार व्यंग्य की भाषा और शैली के बारे में बहुत कुछ सीख सकता है।
निःसंदेह अपने समकाल में भी हम व्यंग्य को जिस रूप में पाते हैं, उसकी उपस्थिति हिन्दी की केन्द्रीय और प्रतिष्ठित कविता में भी बखूबी देखी जा सकती है। अर्थात मुक्त छंद या छंद मुक्त कविताओं में व्यंग्य का उल्लेखनीय निवास है। नागार्जुन, त्रिलोचन, अज्ञेय, भवानी प्रसाद मिश्र, प्रभाकर माचवे, रामविलास शर्मा, केदारनाथ अग्रवाल, रघुवीर सहाय, रामदरश मिश्र, धूमिल, मानबहादुर सिंह आदि से लेकर आज तक की पीढ़ी के उल्लेखनीय कवियों कविताओं में भी। मेरे और इस लेख को पढ़-सुन रहे कवियों में कौन होगा जिसकी कविता में व्यंग्य न आया हो। नामों की सूची पर मत जाइए। वैसे मेरा सुझाव है कि इस संदर्भ में विस्तार में जाने के लिए ऊपर बतायी जा चुकी डॉ. शेरजंग गर्ग की पुस्तक को पढ़ा जा सकता है। एक लंबी सूची हाथ आ जाएगी।
हां, यहां नागार्जुन का विशेष उल्लेख अवश्य किया जा सकता है जिन्हें अपवाद की तरह लगभग व्यंग्य कवि भी कहा जा सकता है। उन्होंने कितनी ही कविताएं राजनीतिक रंग की लिखी हैं और उनमें अधिकतर व्यंग्यपूर्ण हैं। उन्होंने सामन्तवाद के विरुद्ध और जनता को छलने वालों के प्रति भी व्यंग्य बाण छोड़े हैं। व्यंग्य-शैली की दृष्टि से जिसे भिगो-भिगो कर मारना कहते हैं उसका पूरा परिपाक नागार्जुन के यहां मिलता है, इसके बाद रघुवीर सहाय में। त्रिलोचन और भवानी प्रसाद मिश्र ऐसे कवि हैं जिन्होंने,वस्तु, को राजनीति तक सीमित न रख कर व्यापक किया है। समय-समय पर व्यंग्य-यात्रा पत्रिका भी अनेक व्यंग्य प्रधान कविताओं को प्रकाशित करती रहती है। कबीर जैसे व्यंग्य निपुण के खास अध्येता हजारी प्रसाद द्विवेदी का एक कथन याद आ रहा है। उनके अनुसार, “व्यंग्य वह है, जहां कहने वाला अधरोष्ठ में हँस रहा हो और सुनने वाला तिलमिला उठा हो और फिर भी कहने वाले को जवाब देना अपने को और भी उपहास्यापद बना लेना हो जाता हो।“ आज की कितनी ही कविताएं व्यंग्य को समझने के लिए बताई गई परिभाषाओं की कसौटियों पर खरी उतरने का सामर्थ्य रखती हैं।
कविता में जब व्यंग्य आता है तो उसका एक ढब नहीं होता। वह सीधे-सीधे भी हो सकता है और टेढ़ी चाल वाला भी। मिथ में लिपट कर भी आ सकता हे और प्रतीक अथवा संकेत बन कर भी। यही नहीं वह कई ढबों का मिश्रित रूप भी हो सकता है। इस समय जो पीढ़ी लिख रही है उसमें वस्तु की दृष्टि से विस्तार भी हुआ है और नई जमीन भी तोड़ी गई है। स्त्री विमर्श, दलित और आदिवासी विमर्श के संदर्भ में भी व्यंग्य का सहयोग इस पीढ़ी को मिला है। पल्लवी की एक कविता का यह अंश देखिए जो तुलनात्मक दृष्टि से युवा स्वर में निहित व्यंग्य के स्वरूप को सामने लाता है और नारी को लेकर चली आ रही सोच पर व्यंग्य-प्रहार करते हुए एक नए नारी-विमर्श को रचता है-
आपकी इज्ज़त आपके कर्मों में बसी
आपने दान किया... आपकी इज़्ज़त बढ़ी
आपने जग जीता... आपकी इज़्ज़त बढ़ी
आपने आविष्कार किये... आपकी इज़्ज़त बढ़ी
फिर मेरी इज़्ज़त आपने मेरी नाभि के नीचे क्यों बसाई?
मेरे जग जीतने से मेरी इज़्ज़त नहीं बढ़ी
अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने से मुझे मान नहीं मिला
पर मेरे एक रात प्रेम करने से मेरी इज़्ज़त ख़त्म हो गयी
मुझ पर एक शैतान का हमला मेरी इज़्ज़त लूट गया
मैं हैरत में हूँ
मेरे एक ज़रूरी अंग को आपने कैसे मेरी इज्ज़त का निर्णायक बनाया?
किसने आपको मेरी आबरू का ठेकेदार बनाया?
सुशांत प्रिय के, इस रूट की सभी लाइनें व्यस्त हैं, कविता संग्रह में अनेक कविताएं हैं जिनमें व्यंग्य, बिना हाथ-पैर मारे, बेकार की हाय तौबा मचाए, बात-बात पर अधिकांश गद्य में लिखे व्यंग्यों की तरह पत्नी को किसी न किसी रूप में घसीटे, बहुत ही सहज ढंग से, आकर अपना काम कर जाता है। उनकी एक कविता है, विडम्बना, जिसमें आज चालाक हो चुकी दुनिया के हाथों बेवकूफ बन जाने की स्थितियों को व्यंग्य के माध्यम से लाया गया है। कुछ पंक्तियां देखिए:
मैं तुम्हारी प्यास के लिए
मीठे पानी का
कुआं हो गया
मैं तुम्हारी भूख के लिए
तवे पर फूली हुई
रोटी हो गया
सुस्ता कर
भूख प्यास मिटा कर
तुम एक बार फिर
तरो-ताज़ा हो गई
और तब
मैंने देखा
तुम पूछ रही थीं-
“कहाँ रह गया
वह बेवकूफ-सा आदमी
जो मेरी मदद करने का
दावा कर रहा था!”
उनकी एक और कविता है,,वे जो वगैरह थे, जिसमें,वगैरह, लोगों का विडम्बनापूर्ण यथार्थ चित्रित हुआ है। एक अंश इस प्रकार है--
वे जो वगैरह थे
वे बाढ़ में बह जाते थे
वे भुखमरी का शिकार हो जाते थे
वे शीत-लहरों की भेंट चढ़ जाते थे
वे दंगों में मार दिए जाते थे।
वे जो वगैरह थे
वे ही खेतों में फ़सल उगाते थे
वे ही शहरों में भवन बनाते थे
वे ही सारे उपकरण बनाते थे
वे ही क्रांति का बिगुल बजाते थे।
कुमार अनुपम की कविता, काउंसलर कामरेड(?)-कथन, भी देख ली जाए। पंक्तियां खुद अपेक्षित बयान कर देंगी--
घर की याद
सिर्फ और सिर्फ
एक भावुक पिछड़ापन है कामरेड!
कामरेड!
महान चिंताओं का समय है यह
बड़े मसौदों की रणनीति
जोड़ रही है भूमंडल को
यह वक्त नहीं है ऐरी-गैरी
कविता-वविता के लिए वैध
आओ
आओ
राजपथ पर भाग आओ कामरेड!
वरना मिटो कलेजे में दबाए अपना ग्राम!!
अपना संताप!!!
सूरजपाल चौहान ने कविताओं के साथ कितने ही दोहे भी लिखे हैं जिनमें पीड़ा और आक्रोश से उपजा व्यंग्य किसी सांटे से कम नहीं है--
पाँच मिनट की स्वच्छता, थक कर नेता चूर।
मैं ने पूछा जानकर, कैसा लगा हुजूर॥
यहां, जानकर, शब्द का प्रयोग व्यंग्य को और भी मारक बना देता है। कुछ और दोहे यूं है--
अच्छे दिन अब आ गये, शोर मचा सब ओर।
चोर, उचक्के मस्त हैं, गुण्डों का है जोर॥
दस-दस डिग्री साथ में, न कोई उपचार।
चौराहे पर मुरमुरे, बेचे शिव औतार॥
मेरा लेखन शीष पर, दूजे का बेकार।
इस बेढंगी सोच ने, डुबो दिया मझदार॥
इसी क्रम में संतोष श्रेयांस की कविता,बाकी सब ठीक ठाक, पढ़ी जा सकती है जिसमें गांव से, मजबूरी में, महानगर का रुख करती युवा पीढ़ी के लिए, सब कुछ अपेक्षाओं और जीने के विपरीत है लेकिन कहना यही पड़ता है - बाकी सब ठीक ठाक। इस कविता के लिए उनका संग्रह,शुक्रगुजार हूं दिल्ली, पढ़ा जा सकता है।
आज की पीढ़ी असल में उन छोटी-छोटी हरकतों की ओर भी बारीकी से देखती है जिसने पूरे माहौल को ही अविश्वसनीय बनाकर रख दिया है। वैसा माहौल कई बार व्यंग्य की राह में भी पेश किया जाता है, कविता-सुलभ पूरी संजीदगी के साथ। अभिव्यक्ति के खतरे की बात मुक्तिबोध ने भी अपनी दृष्टि से कही थी लेकिन आज की पीढ़ी का कवि जब कहे गए या सुने गए के अजीब जाल में फंसे माहौल को देखता है तो प्रांजल धर की कविता में आज का मनुष्य कुछ यूं प्रकट होता है--
इसीलिए आपने जो सुना, संभव है वह बोला ही न गया हो
और आप जो बोलते हैं, उसके सुने जाने की उम्मीद बहुत कम है...
सुरक्षित संवाद वही हैं जो द्वि-अर्थी हों ताकि
बाद में आपसे कहा जा सके कि मेरा तो मतलब यह था ही नहीं
भ्रांति और भ्रम के बीच संदेह की सँकरी लकीरें रेंगती हैं
इसीलिए
सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि कुछ भी कहना
खतरे से खाली नहीं रहा अब!
अनुज लुगुन भी अपनी कविताओं में महीन व्यंग्य से काम लेते नजर आ जाते हैं। उदाहरण के लिए उनकी कविता,आदिवासी, की ये पंक्तियां पढ़ी जा सकती हैं जिसमें आदिवासी के प्रति विभिन्न दृष्टियों का कच्चा चिट्ठा खोला गया है--
वे जो सुविधाभोगी हैं
या मौक़ा परस्त हैं
या जिन्हें आरक्षण चाहिए
कहते हैं हम आदिवासी हैं,
वे जो वोट चाहते हैं
कहते हैं तुम आदिवासी हो,
वे जो धर्म प्रचारक हैं
कहते हैं
तुम आदिवासी जंगली हो।
वे जिनकी मानसिकता यह है
कि हम ही आदि निवासी हैं
कहते हैं तुम वनवासी हो,
और वे जो नंगे पैर
चुपचाप चले जाते हैं जंगली पगडंडियों में
कभी नहीं कहते कि
हम आदिवासी हैं
आज के समय में, हर जगह बाज़ारवाद का आधिपत्य और उसका खेल किसी से छिपा नहीं है। अत: यह भी व्यंग्य का हेतु बना है। धनबाद (झारखंड) के कवि अनवर शमीम की बहुत ही साधारण दिखने वाली मगर गहरे व्यंग्य से लैस बहुत ही कम लेकिन सटीक शब्दों वाली कविता,खेल-दो, पढ़ें जो इस प्रकार है -,सब्जियां/ज़्यादा हरी हो गई हैं / टमाटर हो गया है /कुछ ज़्यादा लाल/ आलू का मटमैला रंग/गहराता हो जा रहा है / प्याज़ के छिलकों पर/ लिखी जा रही हैं / महंगाई की आयतें/ मंडी में/ चल रहा है / कोई खेल...!, (रेतपथ, जनवरी-जून, 2014).
पुलिस के कुछ भ्रष्ट कर्मियों के अत्याचार और अन्य क्षेत्रों के भ्रष्टाचारी अधिकारियों की करतूतों पर कटाक्ष करते हुए गद्य में काफी अच्छे-बुरे व्यंग्य मिलते हैं। कविता में भी इन विषयों के अनुभव कभी-कभार मिल जाते हैं। कविता हमेशा से फैलाव के स्थान पर बात को घनीभूत ढंग से कम से कम शब्दों में कहती आई है। इधर एक नई उभरती, कम जानी स्त्री-कवि द्रौपदी सिंघार, जो आदिवासी संवेदनाओं को व्यक्त करने वाली कवि है, की कुछ कविताएं पढ़ने का अवसर मिला। पढ़ कर चौंक गया। बात साफ है पर गहरी व्यंजनाओं में लिपटी। तल्ख अनुभूतियों की अभिव्यक्ति ऊपर से सीधी, वर्णनात्मक और प्रहारक प्रतीत होते हुए भी मुझे व्यंग्य की बुनियाद पर खड़ी होने के एहसास भी कराती रही। दो कविताएं आपके सामने रख देता हूं, शेष निर्णय आप स्वयं लीजिए। अनुरोध इतना भर है कि इन्हें बिना किसी से जोड़े, बतौर कविता पढ़ा जाए। पहली कविता है,पेटीकोट, जो जागरूक पाठकों के ध्यान में होगी--
नहीं उतारा मैंने अपना पेटीकोट
दरोगा ने बैठाये रखा
चार दिन चार रात
मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी तीन साल की बच्ची अब तक मेरा दूध पीती थी
भूखी रही घर पर
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट
मेरी चौंसठ साल की माँ ने दिया उस रात
अपना सूखा स्तन मेरी बिटिया के मुंह में
मगर मैंने नहीं उतारा अपना पेटीकोट।
नक्सल कहकर बैठाया रखा चार दिन चार रात
बोला, बीड़ी लेकर आ,
बीड़ी का पूड़ा लेके आई,
चिकन लेके आ रंडी,
चिकन ले के आई,
दारू ला,
दारू लेके आई।
माफ़ करना मेरी क्रांतिकारी दोस्तों
मैं सब लाई जो जो दरोगा ने मंगाया
मेरी बिटिया भूखी थी घर पर
दरोगा ने माँगा फिर मेरा पेटीकोट
मैं उसके मुंह पर थूक आई
भागी,
पीछे से मारी उसने गोली
मेरी पिंडली पर
मगर मैंने उतारा नहीं अपना पेटीकोट!
क्या इस कविता में आई पुलिस की असंवेदनशीलता, धूर्तता, क्रूरता, नपुंसकता आदि पर गहरा व्यंग्य नहीं है और वह भी एक दिशा को लक्षित करते हुए, नारी-विमर्श का एक नया और जरूरी आयाम रचते हुए। अब एक और इसी क्षेत्र की कार्यप्रणाली की कविता पढ़िए जिसमें फिर हमारे आदिवासी समाज की क्रूर यथास्थिति नजर आती हैं, संदेह और छानबीन के नाम पर। जरा व्यंग्य के नए चैप्टर, एक नए आकाश, एक नई शेड की निगाह से पढ़िए--
रात
कनस्तर में आधा किलो आटा था
फैला दिया
साब दो टेम की मेरी रोटी थी
आटे में बारूद छुपाई है
क्या कहते हो
बारूद आटे में नहीं हम
माथे में छुपाते है - लोहा हड्डियों में
हमें भी यह धरती प्यारी है
हमें भी धान प्यारा है
नरमदा हमारी भी मैया है
मटका लात मारी फोड़ दिया
तमंचा पानी में कौन छुपाता है
मंदिर के कुएँ से लाई
पंडितजी एक टेम ही भरने देते है
गोदड़ियाँ फाड़ दी रेडीओ फेंक दिया
जब कुछ न मिला तो
फोड़ दिया आदमी का सर
तूने खून छिपाया है तूने आग छिपायी है
तूने प्रेम तूने जीने की आस छुपाई है
तूने सरकार गिराने का पिलान छिपाया है
बहता रहा खून देर तक
उन्होंने पानी पिया उन्होंने हँसी उड़ाई
हमने लौकी अकेली उबाल के खाई
ऐसे रात बिताई।
ऊपर कुछ उदाहरण देकर (उदाहरण और भी दिए जा सकते थे), मैंने सिर्फ यही बताने और जताने की कोशिश है कि आज की पीढ़ी की हिन्दी कविता भी व्यंग्य की प्रवृत्ति से अछूती नहीं है और वस्तु की दृष्टि से उसका दायरा भी विस्तृत नजर आता है। यह बात अलग है कि हिन्दी की केन्द्रीय धारा में व्यंग्य कविता नाम की कोई धारा अभी रूप नहीं ले सकी है और इसके कवि भी व्यंग्य का प्रयोग सहज भाव से करते नजर आते हैं। अत: ऐसे आशावादी निष्कर्षों से, जिनके अनुसार,व्यंग्य की प्रवृत्ति स्वातंत्र्योत्तर काव्य की सर्वाधिक विकसित और अनिवार्य प्रवृत्ति है तथा इस प्रवृत्ति ने अन्य सभी प्रवृत्तियों के कवियों को भी व्यंग्य करने की ओर प्रेरित और प्रवृत्त किया है, से फिलहाल पूरी तरह सहमत नहीं हुआ जा सकता। केन्द्रीय हिन्दी कविता में ऐसी कविताएं या उनके ऐसे अंश खोजने पड़ते हैं जिनमें गम्भीर व्यंग्य हो। कृपया इसे निराशाजनक स्थिति न समझा जाए बल्कि वास्तविकता के रूप में ग्रहण किया जाए। यहां मैं, अपने आज के अर्थ में व्यंग्य शब्द का प्रयोग कर रहा हूं, व्यंजना अथवा ध्वनि का नहीं, यह स्पष्ट करना जरूरी है।
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एल-1202, ग्रेंड अजनारा हेरिटेज, सेक्टर-74, नोएडा-201301
ई-मेल: divikramesh46@gmail.com
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