अपने अपने बाड़े | व्यंग्य

रचनाकार: ज्ञान चतुर्वेदी

डॉ ज्ञान चतुर्वेदी

देश में बाड़े तैयार करने का काम चल रहा है, सब तरफ। सभी बड़े उत्साह से, और डरे डरे इस काम में लगे हैं। सभी उत्साहित, सभी डरे हुए। उत्साह है तो डर कैसा? पता नहीं, पर है। उत्साह किसी अनाम भय की वजह से तो नहीं? यह उत्साह भी देश को डरा रहा है क्या? कहना कठिन है।

...पर यह तो तय है कि देश में बाड़े बन रहे हैं।

वैसे यह देश हमेशा की भांति एक है। यहां खूब एकता है। हमें इसकी एकता पर गर्व भी है। हम हर मंच से गाने गाते हैं इसकी एकता के। एकता के रंगीन प्लेकार्ड लेकर जुलूस निकालते हैं। शपथ लेते हैं। नारे लगाते हैं। हमारा हर भाषण इसी एकता से पटा पड़ा है। अपनी एकता पर गर्व है हमें। हमारे बाप को भी इस पर कभी बड़ा गर्व था; वैसे वे गर्व करते रह गये और देश का बटवारा हो गया, गर्व का स्वांग उजागर हो गया। अब हम भी वही गर्व कर रहे हैं। अनेकता में एकता पर हमें गर्व है। गर्व से अपनी छाती फुला फुलाकर हमारी छाती दुखने लगी है। श्वास रोक कर छाती फुलाने में हमारा मुँह लाल निकल आया है। यह एकता का स्वांग चल रहा है कि वास्तव में एकता ही चल रही है - पता नहीं चल पा रहा। हमारी एकता एक बड़ा सच जरूर है पर बाड़ा तैयार करने वालों की ताकतवर मौजूदगी भी आज उतना ही बड़ा सच बन गया है।

...यूं तो बहुत बड़ा देश है यह।

यह इमारत बाहर से बड़ी भव्य और आलीशान है। इसकी डिजाइन देखें तो मकान ओरिजिनली बहुत खुला बनाया गया था, ऐसा लगता भी है। यहां संविधान के आंगन में सबके मिलने की जगह बनाई गई थी। देश के आंगन में आज भी राष्ट्र की वह सर्वमान्य धार्मिक पुस्तक रखी हुई है। हम इसकी पूजा भी करते हैं। नित्य ही संविधान की इस पुस्तक पर बयानों, शपथ और भाषणबाजी की अक्षत रोली चढ़ाई जाती है। इसी बड़ी इमारत में हमारा संयुक्त परिवार रहता है। हमें गर्व है कि हमारे परिवार का एक ही नाम है। बाहरी लोग हमें इसी इमारत के नाम से जानते हैं। यही घर हमारी पहचान है... पर धीरे धीरे यह संयुक्त परिवार एक ढकोसला बनता जा रहा है। इस परिवार के जिम्मेदारों ने मानो अब अलग अलग रहने की ठानी है। घर में ही बाड़े बन रहे हैं। बाहर से घर अभी भी वही है पर अंदर ही अंदर, यहां वहां, कच्ची पक्की दीवारें खड़ी की जा रही हैं। पार्टीशन खड़े हो रहे हैं। कार्ड बोर्ड ठुक रहे हैं। टीन पत्तर खड़े हो रहे हैं। न जाने कितने तरह के पार्टीशन रोज उठ खड़े होते हैं। पोस्टरों की दीवार। नारों के फट्टे। अफवाहों की कच्ची दीवारें। धर्म की आड़। अजान की बागड़। पूजा कीर्तन की कनात। जाति संप्रदाय के पटिये। तरह तरह के बाड़े बन रहे हैं। घर के जिम्मेदार लोग इन्हीं बाड़ों में अहर्निश व्यस्त हैं।

बाहर से इमारत अभी भी उतनी ही भव्य है। खूब खुलेपन का भ्रम भी होता है। दरअसल, शुरू के नक्शे पर तो इमारत बहुत खुली खुली ही बनी थी। पुरखे इसे बहुत खुला बनाकर ही गये हैं। बाहर से आज भी वही भ्रम कायम भी है। बल्कि बाद में निरंतर होते रहे रंग-रोगन द्वारा आजकल यह और भी शानदार लगने लगी है। फिर? फिर क्या! इमारत शानदार बनी रही पर इसका आंगन दिन ब दिन संकरा होता चला गया। कैसे? क्योंकि अंदर ढेरों पार्टीशन खड़े करके इसके कमरों, बरामदों, आंगन और रसोई को बार बार बांटा जाता रहा है। खुली इमारत के भीतर बहुत संकरापन पैदा होता जा रहा है। पार्टीशनों के कारण हर जगह संकरी महसूस हो रही है। जगहें तंग, रास्ते संकरे, ताजी हवा के झरोखे बंद, खिड़कियां तो और भी जोर से बंद; घुटन होती है, पर इस घुटन के बड़े दिलकश नाम दे दिये गये हैं, और आपसे उम्मीद की जाती है कि आप इसी पर गर्व करें। संकरेपन की शिकायत सभी को है परंतु सभी अपनी तरफ के पटियों पर रोज नई कीलें ठोककर अपने पार्टीशन को समुचित मजबूती दे रहे हैं। परिवार के हर जन को अपना वाला पार्टीशन मजबूत चाहिये। घर में घरवालों द्वारा ही इक दूसरे पर हमले का अंदेशा है, सो रोज एक नई कील। रोज एक नया पटिया। रोज नये आंदोलन। रोज नये शिगूफे। रोज नये फतवे। रोज चटखारे वाले बयान। बाड़े रोज रोज और संकरे होते जाते हैं। नये नये बाड़े बन रहे हैं। अब तो पुराने बाड़ों में ही नये बाड़े तैयार किये जा रहे हैं। जहां बंटवारे की कल्पना भी नहीं की थी, जहां और बंटने की गुंजाइश ही नहीं बची थी वहां भी पटिये तथा अन्य सामग्री डाले जा रहे हैं। मानो झुग्गी तान दे कोई मौके की जगह निकालकर।

घर अभी भी उतना ही बड़ा और खुला हुआ है। देश अभी भी महान है। पर सब तरफ संकरापन भी ऐसा और इतना है कि बस, घुटन ही घुटन। तो इसकी कोई शिकायत क्यों नहीं करता है? करो न श्रीमान? करो तो। सब सुनेंगे। चलिये, आप कहते हैं तो हम करके देखते हैं। बताइये, किससे करें? घर के जिम्मेदार लोग और परिवार जन तो इस घुटन का उत्सव मनाने पर तुले हैं। वे अभी उत्सवों से फ्री ही नहीं। वे घुटन में श्वास, संकरे में खुलापन और पार्टीशनों में परंपरा को खोज रहे हैं। परिवार के जिम्मेदार हमें समझाने पर तुले हैं कि यहां सब ठीक है, कहीं से भी अप्रिय घटना का समाचार नहीं है। बाड़े जरूर हैं पर लोकतांत्रिक तरीके से खड़े किये जा रहे हैं; लोग बाड़ों में हैं पर स्वतंत्र हैं। लोगों को तो अपनी इस इमारत पर गर्व होना चाहिये, और इन बाड़ों पर भी। जिम्मेदारों को खुशी है कि लोग अब जाकर अपनी पुरातन परंपराओं की तरफ मुड़े हैं। लोग इतिहास के मलबों से कीलें चुनकर अपनी गहरी जेबों में भर रहे हैं। सही जगह मिलते ही वे ये ये कीलें ठोकेंगे। बड़ा उत्साह है परिवार में। अभी जो सारे शहर को ठप्प करता हुआ जुलूस निकाला था हमने, उसे देखा न आपने? रैली में हमारी जुटाई भीड़ को देखा कि नहीं? मंच से हमारे साहब की हुंकार सुनी? आंगन में हमारा कोरम देखा? हमारा तीखा बयान पढ़ा? हमने जो व्हाट्सएप पर यहां से वहां तक फैलाया वह सफेद झूठ आप तक पहुंचा कि नहीं? हमने मंच से उनको जो सीधे सीधे गाली दी, वह सुनी आपने? हमने जो उनके बाड़े में थूका तो कैसे तिलमिलाये स्साले, देखा न आपने?

इमारत के अहाते में रोज ही बाड़ा बनाने का मटेरियल डाला जा रहा है। रोज ही सामग्री से लदे ट्रक शहर में आ रहे हैं। रोज कुछ अनजान से चेहरे शहर में उतरते हैं। रोज ही कानाफूसियां बढ़ती जाती हैं। मंदिर मार्ग पर अफवाहें कीर्तन गाती आ-जा रही हैं। मस्जिदों की सड़क पर बाड़े बनाने की सामग्री गिराने वाले कौम के लोगों को बता रहे हैं कि पूरी कौम को बाड़ा बनाने की ट्रेनिंग लेने का समय आ गया है। शहर के हर नागरिक के कंधे पर बाड़े बनाने की सामग्री लदी हुई है। जिन लोगों ने सामग्री को अभी भी नहीं उठाया है उनकी राष्ट्रभक्ति संदिग्ध मानी जा रही है। उनकी परीक्षा लेने वाले जिम्मेदार सब कुछ जांचते परखते घूम रहे हैं। हर नागरिक इस परीक्षा से गुजर रहा है। उसे किसी भी स्तर पर कभी न कभी अपने फेल होने का डर सता रहा है। इसी डर से, बाड़े बनाने में वह भी पीछे नहीं रहना चाहता है। देशभक्ति की परीक्षा के पेपर का अब यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन गया है कि तुमने कितने बाड़े तैयार करने के लिये अपना हाथ बढ़ाया? इसीलिये, सब कहते तो हैं कि यह सब ठीक नहीं हो रहा पर सब इसमें लगे भी हैं। हर नागरिक हैरान है कि कौन आधी रात में, मेरे दरवाजे पर बाड़े बनाने की इतनी सामग्री पटक जाता है? बेआवाज़ गाड़ियां। खोखले नारों में भरी विस्फोटक सामग्री। पोस्टरों से झांकते हुए अजीब अजीब चेहरे कि जिनके चेहरे तो आदमी जैसे हैं तो पर उन पर आंखें लोमड़ी की लगी हैं। शहर अपरिचित चेहरों से अंटा पड़ा है। परिचित चेहरे भी अपरिचित क्यों होते जा रहे हैं? बाड़ की दूसरी तरफ बैठा हुआ वह शख्स जो सालों मेरा पड़ोसी था, उसे कल अकेले में देखकर मैं घबरा क्यों गया? कल जो नकाबपोश मेरे घर के अहाते में घूम-घूमकर हवा को धमका रहे थे वे कौन थे?

एक भव्य इमारत खड़ी है दुनिया के आंगन में। यह अब भी भव्य है पर खुद इसका आंगन रोज रोज और भी संकरा क्यों होता जा रहा है?

-ज्ञान चतुर्वेदी
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