नगर में जब यह खबर फैली कि सरकार ने जनता के सर्वांगीण विकास के लिए “औकात मापन कार्यालय” खोल दिया है, तो लोगों ने इसे उसी श्रद्धा से स्वीकार किया, जिस श्रद्धा से वे हर नई योजना को स्वीकार करते आए थे— पहले हँसकर, फिर डरकर, और अंत में लाइन लगाकर। सरकारी विज्ञप्ति में साफ लिखा था कि समाज में बढ़ती अव्यवस्था का मूल कारण यह है कि लोग अपनी औकात से बड़े सपने देखने लगे हैं, और राष्ट्रहित में अब यह ज़रूरी हो गया है कि हर नागरिक को वैज्ञानिक तरीके से उसकी सही नाप बता दी जाए, ताकि वह उसी में फिट रहकर सुखी जीवन जी सके।
नगर के बुजुर्गों ने इसे संस्कृति की रक्षा का अभियान बताया, युवाओं ने इसे अवसर समझा, और मध्यवर्ग ने राहत की साँस ली कि चलो, अब असफलता भी प्रमाणपत्र सहित मिलेगी। पुराने गोदाम को दफ्तर में बदला गया, बाहर बोर्ड टँगा— “अपनी औकात जानिए, जीवन सरल बनाइए”— और भीतर एक मशीन रख दी गई, जिसे देखकर लगता था कि वह आदमी की हड्डियाँ नहीं, उसके भ्रम नापती है। इसी बीच नगर के समझदार लोग यह भी बताने लगे कि यह सब उसी ऐतिहासिक परंपरा का विस्तार है जिसमें इंसान की पहचान उसकी अक्ल से नहीं, बल्कि उसके साइज और पैमाने से होती आई है— सभ्यता ने पत्तों से लंगोट और लंगोट से एक्स्ट्रा लार्ज तक का ऐसा सफर तय किया है कि अब आदमी खुद को नहीं, बल्कि अपने घेरे को पहचानता है।
बाजार ने पहले ही सिखा दिया था कि आपकी नैतिकता नहीं, आपकी कमर का घेरा महत्वपूर्ण है; सेल्समैन आपको वैसे नापता है जैसे पटवारी विवादित जमीन नापता है। अब सरकार ने वही काम राष्ट्रीय स्तर पर संभाल लिया था— कपड़ों के बजाय सपनों की फिटिंग की जा रही थी।
पहले ही दिन दफ्तर के बाहर ऐसी लाइन लगी जैसे मुफ्त राशन बँट रहा हो। हर चेहरे पर गंभीरता और भीतर छिपी उम्मीद थी कि मशीन शायद उसे उसकी कल्पना से थोड़ा बड़ा घोषित कर दे। नगरपालिका का लिपिक रामलाल भी इसी आशा में सबसे आगे जा खड़ा हुआ। वह वर्षों से यह भ्रम पालकर जी रहा था कि ईमानदारी और मेहनत से आदमी ऊपर उठ सकता है— एक खतरनाक किस्म का निजी रेडीमेड सपना, जो किसी सरकारी साइज चार्ट में फिट नहीं बैठता। जब उसकी बारी आई, अधिकारी ने बिना सिर उठाए नाम, पेशा और “महत्वाकांक्षा का स्तर” पूछा। मशीन चली, घरघराई, और स्क्रीन पर उभरा— “औकात: सीमित। महत्वाकांक्षा: अनुपयुक्त। सलाह: अपेक्षाएँ घटाएँ।”
पर्ची हाथ में आते ही रामलाल को लगा कि उसकी आत्मा को रेडीमेड खांचे में ठूँस दिया गया है। बाहर लोग उसकी रिपोर्ट ऐसे पढ़ रहे थे जैसे कोई मेडिकल परीक्षण हो— संतोष इस बात का था कि बीमारी सामूहिक है। धीरे-धीरे नगर बदलने लगा। लोग बोलने से पहले अपनी औकात देखते, प्रेम करने से पहले श्रेणी मिलाते, और सपनों को आधा कर जेब में रखते।
कवि औकातसम्मत गीत लिखने लगे, छात्र फॉर्म भरने से पहले मशीन से अनुमति लेने लगे। पुराने जमाने के दर्जियों की तरह, जो देह की नाप लेकर रिश्ता बनाते थे, अब कोई नहीं बचा था; रेडीमेड व्यवस्था में आदमी को खुद को काट-छाँटकर फिट होना था— ठीक वैसे ही जैसे सरकारी योजनाओं के मानक आकार में जनता को ठूँसा जाता है। जो फिट हो गया वह आधुनिक, जो बाहर रह गया वह रिजेक्टेड माल। शिक्षा भी प्रतिशत के इंचीटेप से नापी जाने लगी— एक अंक कम और बच्चा त्रुटिपूर्ण कपड़ा घोषित। कोचिंग सेंटर गारंटीशुदा फिटिंग की दुकानें बन गए, जहाँ बचपन काटकर सफलता का कोट सिल दिया जाता था।
दफ्तरों में तो पैमाने का अलग ही विज्ञान विकसित हो चुका था। फाइल की मोटाई से साहब की दृष्टि तय होती— दो इंच की फाइल पर उन्हें कुछ दिखाई नहीं देता, चार इंच होते ही उनकी आँखें दिव्य हो उठतीं। मामूली क्लर्क अपनी मेज का घेरा इतना बढ़ा लेता कि आम आदमी वहाँ पहुँचते-पहुँचते अपनी आधी उम्र गंवा देता।
भ्रष्टाचार ने अपना पेशेवर टेलरिंग कोर्स बना लिया था— रिश्वत का साइज ऐसा रखो कि कानून की जेब से बाहर न झाँके। राजनीति में नेता का कद स्कूलों या सड़कों से नहीं, रैली की भीड़ के साइज से तय होता; पुलिस का इंचीटेप अलग, समर्थकों का अलग। घोषणापत्र रंगीन थान की तरह जनता के सामने फैलाया जाता— वादा कि सबको फिट आएगा— और अंत में पता चलता कि कोट बना ही नहीं, बस जनता की जेब कट गई।
विकास को जीडीपी और चमकीले आँकड़ों के फीते से नापा जाता, जबकि आम आदमी अपनी थाली की सिकुड़ती रोटी नाप रहा होता। सड़कों की लंबाई का दावा किया जाता, आदमी गड्ढों की गहराई मापता। धर्म भी साइज का खेल बन गया— भक्ति पंडाल की ऊँचाई और लाउडस्पीकर की दूरी से मापी जाती, श्रद्धा को कंक्रीट के घेरे में बंद कर वीआईपी फीते से सजाया जाता। नगर में यह सब इतना सामान्य हो गया कि औकात मापन कार्यालय सिर्फ इस व्यापक माप-तंत्र का आधिकारिक संस्करण लगने लगा— एक ऐसा कारखाना जहाँ आदमी उत्पाद भी था और मजदूर भी।
फिर घोषणा हुई कि मशीन का विशेष सत्यापन होगा— बड़े अधिकारी, उद्योगपति, नेता सब अपनी औकात मपवाएँगे। नगर में उत्साह लौट आया। जब पहला बड़ा अधिकारी मशीन पर चढ़ा, मशीन चुप रही, काँपी, और स्क्रीन पर उभरा— “त्रुटि: औकात कृत्रिम। सम्मान: पद-निर्भर। आत्ममूल्य: अनुपलब्ध।” प्रिंटर से पर्चियाँ गिरने लगीं— “औकात: उधार की”, “महानता: प्रचारित”, “सत्ता: अस्थायी।”
कमरे में वह सन्नाटा था जो तब उतरता है जब आईना अचानक सच बोल दे। आदेश हुआ मशीन बंद करो, पर वह जैसे वर्षों का हिसाब उगल चुकी थी। अंततः धुआँ निकला और मशीन शांत हो गई। अगले दिन दफ्तर पर ताला था— “तकनीकी कारणों से सेवा स्थगित।”
नगर ने इसे भी सहजता से स्वीकार किया। रामलाल ने अपनी पर्ची संभालकर रखी। एक रात उसने सपना देखा— मशीन फिर सामने है, शांत, और स्क्रीन पर लिखा है: “मनुष्य की औकात उसकी सीमा नहीं, उसकी संभावना है।” सुबह उसकी जेब में नई पर्ची थी— “औकात: असीम। शर्त: विश्वास बनाए रखें।”
वह देर तक सोचता रहा कि इस विशाल माप-कारखाने में आखिर क्या चीज है जिसे कोई फीता नहीं नाप पा रहा— इंसानियत। उसे लगा कि हम सब एक-दूसरे की कमीज नापने में इतने व्यस्त हो गए हैं कि अपनी नग्नता ढंकने को चरित्र का धागा भी नहीं बचा। उस क्षण उसे एक विचित्र, मार्मिक और अकल्पनीय सच्चाई समझ आई— जब अंतिम इंचीटेप चलेगा, तब न फाइल की मोटाई गिनी जाएगी, न भीड़ का साइज, न प्रतिशत, न पंडाल की ऊँचाई। तब सिर्फ यह देखा जाएगा कि इस सीमित कद के शरीर में आदमी कितना बचा था।
रामलाल ने पर्ची मोड़ी, जेब में रखी, और बिना किसी माप के घर से निकल पड़ा— पहली बार अपनी औकात नहीं, अपनी संभावना लेकर। नगर वैसा ही था, पर उसे लगा कि असली क्रांति मशीन के बंद होने में नहीं, आदमी के भीतर लगी उस अदृश्य माप-यंत्र के टूटने में है। और शायद उसी दिन, उसी शांत सुबह, इतिहास ने दर्ज किया कि तमाम पैमानों के बावजूद एक आदमी ने तय किया—वह अब नापा नहीं जाएगा।
-डॉ सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'