वेस्ट नहीं, इन्वेस्टमेंट समझे जाने की जरूरत | व्यंग्य

रचनाकार: शांतिलाल जैन

9 नवंबर, 2025, जैन परिवार पूर्व और वर्तमान के सभी सरकारी कर्मचारियों,अधिकारियों का आभार व्यक्त करता है। काम के प्रति आपकी उदासीनता और बेरुखी के कारण हमारा परिवार देश के विकास के लिए, सरकारी खजाने में अत्यंत मामूली ही सही, योगदान दे तो पाया है। इसका पता भी हमें आज ही अख़बारों से चला जब सरकार ने संसद में बताया कि सरकारी दफ्तरों में चले सफ़ाई अभियान में रद्दी बेचकर सरकार को चार हज़ार पिच्चासी करोड़ रुपए मिले हैं। निश्चित ही इसमें वो फाइल भी रही होगी जिसमें दादाजी ने राशनकार्ड के लिए एप्लाय किया था और ताउम्र चक्कर काटने के बाद भी बन नहीं पाया था। उस मोटी सी पेंडिंग फाइल का डब्बा-बाटली वाले ने कम से कम एक रुपया तो दिया ही होगा। राष्ट्र के विकास में हमारे साधारण से मुफ़लिस परिवार से एक रुपए का योगदान भी कम नहीं होता श्रीमान्।
  
आप ही सोचिए, जो हमारे दादाजी ने उस समय राशन कार्ड बनवाने में टाइम वेस्ट नहीं किया होता तो आज ‘वेस्ट से वेल्थ’ कैसे बना पाती सरकार? फाइलों के पहाड़ों को वेस्ट नहीं इन्वेस्टमेंट के नज़रिए से देखे जाने की जरूरत है। देश भर में लाखों बाबूओं ने जो अपनी काहिली, कामचोरी और भ्रष्टाचार से आम आदमी को यह इन्वेस्टमेंट करने के लिए विवश नहीं किया होता क्या आज  सरकार चार हज़ार करोड़ कमा पाती!! जो कागज़ कभी आम नागरिकों को उनके अधिकार नहीं दिला पाए अब सरकार का रेवेन्यू मॉडल बन चुके हैं। 

फिर बात सिर्फ आर्थिक योगदान की नहीं है, मंत्रीजी ने यह भी बताया कि ‘ज़्यादातर पेंडिंग फाइलें और दूसरे पेपरवर्क के रूप में अटाला हटाने से 923 लाख वर्गफुट ऑफिस स्पेस खाली हुआ, इतनी जगह में एक बड़ा मॉल या वैसी ही बड़ी बिल्डिंग बन सकती है। जैन परिवार के राशन कार्ड की फाइल ने एक वर्गफुट जगह भी खाली करने में मदद की हो तो इसे मामूली योगदान न समझा जाए श्रीमान्। हम दादाजी के लिए कोई पद्म पुरस्कार नहीं मांग रहे, उनके योगदान की पावती भर मिल जाए, बस। लेमिनेट करा कर उनकी तस्वीर के बाजू में लगाकर हम उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहते हैं। इससे हमारा अपराध बोध कम होगा। अब तक हम उन्हें झक्की इंसान समझते रहे। उस ज़माने की प्रचलित दरों के अनुसार उन्होंने पाँच रुपए की रिश्वत दे दी होती तो महज़ एक पेज की दरख्वास्त में उसी समय काम हो गया होता। वे झक्की नहीं दूरदर्शी थे। पहले एप्लीकेशन, फिर एफिडेविट, फिर मूलनिवासी का प्रमाणपत्र, फिर रिमाइंडर, रि-एप्लाय, रि-रिमाइंडर के कागज़ सबमिट कर-कर के देश के खजाने में तभी अपना योगदान करके चले गए। वे बो गए थे, सरकार काट रही है।

बहरहाल, आज से जैन परिवार सरकार का मुरीद हो गया है। उसने अब जाकर यह रियलाइज़ किया है कि बेचने के मामले में सरकार की नज़र में सब समान है। वह सरकारी दफ्तरों से निकले जूने-पुराने अटाले को भी उसी शिद्दत से बेच लेती है जिस शिद्दत से एयरलाइंस, पोर्ट, एयरपोर्ट, सार्वजनिक उपक्रमों, उद्यमों को बेच लेती है। जब बेचने ही निकले हैं श्रीमान् तो क्या लकड़ी के जंगल और क्या लकड़ी की टूटी कुर्सी!! सरकार वेस्ट बेचकर वेल्थ बनाने के मिशन पर काम कर रही है। इस बेचने को सरकार बेचना कहती भी नहीं, असेट मोनेटाइजेशन कहती है। 

नेशन के लिए असेट मोनेटाइजेशन में अपने अल्प किन्तु महत्वपूर्ण योगदान से जैन परिवार गौरवांवित अनुभव करता है और उन सभी बाबूओं का आभार व्यक्त करता है जिनकी काहिली, लापरवाही, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के कारण जैन परिवार को यह सुअवसर प्राप्त हुआ है। 

आभार।

-शांतिलाल जैन

संपर्क
बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) 456010, M-9425019837