बड़े साहेब को शहर के वर्क्स डिपार्टमेंट में चीफ इंजीनियर पद पर अभी पोस्ट हुए जुम्मा-जुम्मा आठ दिन ही हुए थे। उनके कक्ष में घुसते ही बेहतरीन अगरबत्ती और इत्र की सुगंध आगंतुक का स्वागत करती थी। उनसे मिलकर हर व्यक्ति उनकी धर्मपरायणता का कायल हो जाता। चंद दिनों में ही दफ्तर और दफ्तर के बाहर बड़े साहेब के धार्मिक होने की खूब चर्चा होने लगी।
उनके कार्यालय में ठेकेदार अभिनव कोयल का शहर को स्वच्छ आपूर्ति की पाइप लाइन डालने के किए गए काम का दस करोड़ का बिल एक बरस से अटका हुआ था। बार-बार चक्कर काटने के बाद भी बिल पास नहीं हो रहा था। हर बार लेखा विभाग कोई न कोई आपत्ति लगाकर बिल लौटा देता था। उस ठेकेदार तक भी साहेब के धार्मिक होने की खबर पहुंची। आजकल ऐसी खबरें बिना किसी विज्ञापन के खूब प्रचारित और प्रसारित की जाती हैं। साहेब के धार्मिक होने की खबर सुनकर ठेकेदार अभिनव कोयल का दिल बल्लियों उछलने लगा। उसे लगा अब उसके भी घूरे की तरह दिन बहुरने वाले हैं।
उस दिन ज्यादा धर्म-कर्म न करने वाले ठेकेदार अभिनव कोयल ने सुबह उठकर पूजा की। बड़े साहेब को प्रभावित करने के लिए लेकिन चन्दन का टीका थोडा सा बड़ा लगाया। माथे के बीच में सिन्दूर की गोल बिंदी लगाई। भगवान के सामने सौ रुपये का पेड़ा भोग के लिए रखा। पूजा के बाद गले में तुलसी की माला डाली और कमीज में गले के नीचे तक के दो बटन खुले रखे ताकि माला दिखती रहे। कपड़ों में साहेब के कमरे में महकने वाला ही इत्र लगाया और साहेब को मिलने के लिए रवाना हो गया।
चीफ इंजीनियर के कार्यालय पहुंचकर उसके पीए को अपना कार्ड थमा दिया। दस मिनट बाद ठेकेदार अभिनव कोयल को बड़े साहेब ने मिलने का बुलावा आया। ठेकेदार ने बड़े गर्व से कमरे में प्रवेश किया। कमीज का तीसरा बटन भी खोल दिया ताकि तुलसी की माला उन्हें ठीक से दिख जाए। वैसे तो अभिनव कोयल के माथे पर लगा टीका भी अपना सन्देश ठीक-ठाक दे ही रहा था।
‘सर मेरा नाम अभिनव कोयल है। मैं कोयल कंस्ट्रक्शन कम्पनी का मालिक हूँ।’
‘आपका स्वागत है। कहिये, मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’
‘सर, आपकी बड़ी प्रशंसा सुनी है। मुझे पता चला है कि आप भी मेरी तरह ईश्वर के अनन्य भक्त हैं। आपके कमरे में प्रवेश करते ही मुझे लगा कि यह कमरा आपके व्यक्तित्व की सुगंध से सराबोर है। मैं यहाँ आकर दिव्यता का अनुभव कर रहा है। आपके जैसे देवतुल्य अधिकारी की इस कार्यालय में बहुत दिनों से कमी महसूस की जा रही थी। पुराने वाले साहेब तो बड़े कानूनची थे। किसी की जरा भी नहीं सुनते थे। आपके आने से ठेकेदार समुदाय में ख़ुशी की लहर दौड़ गई है।’
‘सो तो ठीक है। आप किस कार्य के लिए यहाँ पधारे? कृपया बताये!’
‘सर मेरा एक दस करोड़ का बिल पिछले एक साल से पेंडिंग है। आप पर गणेश जी की कृपा है। कृपया मेरा बिल पास कराकर मेरा भी कल्याण कीजिये,’ कहकर ठेकेदार ने बड़े साहेब की टेबल पर रखे गणेश जी के समक्ष अपना शीश नवाया।
‘ठीक है। काम हो जायेगा। अभिनव जी, लक्ष्मी जी इधर विराजमान हैं। गणेश जी के साथ उनकी कृपा भी चाहिए।’ बड़े साहेब ने बराबर में रखी मूर्ति की ओर इशारा कर दिया।
लगभग आधा घंटे के बाद कमरे से अभिनव कोयल के बाहर निकलते ही बड़े साहेब के पीए ने उसे रोककर बताया – ‘साहेब ने इण्टरकॉम पर लेखा विभाग को आज ही बिल को पास करने के लिए कह दिया है।’
‘साहेब बड़े धार्मिक व्यक्ति हैं। हम जैसे धार्मिक लोगों का काम नहीं होगा तो फिर किसका होगा?’ अभिनव ठेकेदार ने गर्व सीना फुलाकर से भरकर पीए को बताया। अभिनव कोयल ने कमीज के सारे बटन तो बाहर निकलते ही बंद कर लिए थे।
‘कोयल साहेब, आपने बिलकुल ठीक कहा। आपका काम क्यों नहीं होगा – आखिर धर्म का काम जो ठहरा। और हां, धर्म के काम में थोडा ज्यादा खर्च हो भी जाये तो भी आदमी को चुभता नहीं।’ पीए ने तुर्की-ब-तुर्की जवाब देकर ठेकेदार अभिनव कोयल को बगलें झाँकने पर विवश कर दिया। लेकिन ठेकेदार ने पीए के ज्यादा मुंह लगना उचित नहीं समझा। उसे भी पता था कि वह चीफ इंजीनियर से किसी भी मामले में कम नहीं है। उसने भी दो फीट के डायमीटर के पाइप की जगह एक फीट के डायमीटर का पाइप डाला था।
-रामकिशोर उपाध्याय, IRAS (Retd.)
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