विषय ही विषयी संसार का सार है | व्यंग्य 

रचनाकार: राजेन्द्र मोहन शर्मा 

जो दिन-रात भरमाते हैं कि विषय छोड़ दो विषय से परे रहो विषय विष समान है वे निरे अज्ञानी क्या जाने विषय राग को। विषय है तो ज्ञान है आप ही बताइए किसी विषय के बिना कहीं कोई तालीम कहीं कोई डिग्री पूरी होती है। विषय है तो संदर्भ है विषय है तो मुद्दा मुरझाता नहीं। सो हे संसारियों साहित्य अनुरागियों विषय से बचो मत इसमें आकंठ डूबो। ज्यों खोजा तिन पाइया विषये पानी पैठ। बोलने का तौलने का खोजने और ढोने का हर मसला विषय या विषयांतर ज़रूर होगा।  अगर मसला विषय परिधि में है तो विषय की खाल के बाल खूब नुचेंगे ही गर ऐसा न हुआ तो काहे का विषयानुकूल। और जो विषयांतर हुए तो छप्पन भोगों सरीखे विविध विषयों को आप वहीं अपने इर्द-गिर्द तैरते पाओगे। 

संसार की समस्त हलचलों के केंद्र में जो एक अदृश्य धुरी घूम रही है, वह विषय ही तो है। लोग कहते हैं विषय विष है, पर क्या उन्होंने कभी सोचा है कि बिना विष के शिव का अस्तित्व और बिना विषय के जीव का व्यक्तित्व भला कैसे पूर्ण हो सकता है? जो अज्ञानी दिन-रात वैराग्य की डुगडुगी बजाते हैं और कहते हैं कि विषयों से परे हट जाओ, वे दरअसल उस अमृत से ही कतरा रहे हैं जिसने ब्रह्मांड को एक सूत्र में पिरो रखा है। विषय ही तो वह बीज है जिससे ज्ञान का वटवृक्ष पल्लवित होता है। तनिक सोचिए, बिना किसी विषय के क्या कोई पाठशाला सजेगी? क्या कोई डिग्री किसी दीवार की शोभा बढ़ाएगी? यदि इतिहास का विषय न होता तो अतीत एक मूक पत्थर मात्र होता और यदि विज्ञान का विषय न होता तो भविष्य एक कोरी कल्पना। विषय है तो संदर्भ की सुगंध है, विषय है तो तर्कों की गरमाहट है और विषय है तो किसी भी मुद्दे की उम्र लंबी है, वरना तो विचार पैदा होने से पहले ही दम तोड़ दें।

हे साहित्य के अनुरागियो और इस संसार के चतुर खिलाड़ियों, इस विषय रूपी सागर से किनारा मत करो, बल्कि इसमें आकंठ डूब जाओ। जैसे गोताखोर गहरे पानी में उतरकर मोती ले आता है, वैसे ही तुम भी इस विषय के अथाह जल में पैठो, क्योंकि 'ज्यों खोजा तिन पाइया विषये पानी पैठ'। यहाँ तैरना ही जीना है और डूबना ही तरना है। बोलने की शक्ति, तौलने की बुद्धि, खोजने की ललक और जीवन के बोझ को ढोने का सामर्थ्य— इन सबका मूल आधार कोई न कोई विषय ही तो है। संसार का हर मसला या तो विषय की परिधि में दम भरता है या फिर विषयांतर होकर नए विषयों को जन्म देता है। यदि मसला अपनी निश्चित परिधि में है, तो यकीन मानिए, उस विषय की खाल के बाल खूब नुचेंगे, क्योंकि बाल की खाल निकालना ही तो विद्वत्ता की पहली और अंतिम सीढ़ी है। जब तक किसी विषय को पूरी तरह छील न दिया जाए, जब तक उसे तर्क की आंच पर भून न दिया जाए, तब तक भला वह 'विषयानुकूल' कैसे कहलाएगा?

किंतु, जो लोग एक ही विषय से ऊबकर विषयांतर होने की कला जानते हैं, उनके लिए तो यह संसार छप्पन भोगों की एक सजी-सजाई थाली है। एक विषय से छूटे नहीं कि दूसरा विषय अपनी बाहें फैलाए आपके इर्द-गिर्द तैरता हुआ मिलेगा। जैसे एक फूल से दूसरे फूल पर मँडराते भँवरे को कभी रस की कमी नहीं होती, वैसे ही विषयांतर होने वाले रसिक को कभी वैचारिक दरिद्रता नहीं सताती। विषयांतर होना दरअसल पलायन नहीं, बल्कि एक विषय की संकीर्णता से निकलकर अनंत विषयों के विराट उत्सव में सम्मिलित होना है। यह संसार एक ऐसा बाज़ार है जहाँ हर तरफ विषयों की प्रदर्शनी लगी है। कोई राजनीति के विषय में मदहोश है, कोई अध्यात्म के विषय में उलझा है, तो कोई अर्थ के विषय में अनर्थ कर रहा है।

देखा जाए तो यह पूरी सृष्टि ही एक महा-विषय है। ब्रह्मा, विष्णु और महेश भी तो सृष्टि, पालन और संहार के विषयों में ही तो व्यस्त हैं। फिर हम अदने से इंसान भला निर्विषय होने का ढोंग क्यों करें? विषय की व्याप्ति ऐसी है कि वह शब्द में अर्थ बनकर, देह में प्राण बनकर और बुद्धि में विचार बनकर रची-बसी है। जो इस मर्म को समझ गया, वह जान लेगा कि विषय ही विषयी संसार का एकमात्र सत्य और सार है। बाक़ी सब तो केवल धुंध है, केवल शब्दों का आडंबर है। इसलिए, विषयों से डरो मत, उन्हें अंगीकार करो, क्योंकि इस संसार की महफ़िल में वही सबसे बड़ा कलाकार है जो एक विषय को छेड़कर सबको विषयांतर कर दे और फिर भी विषय की गरिमा को बचा ले जाए। यही वह कला है जो साधारण को वरिष्ठ और साहित्य को कालजयी बनाती है। विषय की इस गंगा में डुबकी लगाओ, क्योंकि यहाँ हर लहर एक नया पाठ है और हर भँवर एक नई तालीम।

राजेंद्र मोहन शर्मा जी के उस व्यंग्य को जब हम धर्माचार्यों के चश्मे से देखते हैं, तो 'विषय' की महिमा और भी निराली हो जाती है। अब इस गद्य प्रवाह को उसी संशोधन के साथ आगे बढ़ाते हैं:

तप और त्याग की बातें करने वाले इन धर्माचार्यों को देखिए, जो ऊँचे मंचों पर बैठकर संसार को 'विषय-वासना' से मुक्त होने का उपदेश देते हैं, पर स्वयं जिस विषय की व्याख्या में घंटों पसीना बहाते हैं, वह क्या बिना विषय के संभव है? वे कहते हैं कि विषय विष के समान है, पर ज़रा उनके पंडालों की भव्यता और उनके प्रवचनों की गहराई को तो देखिए—वहाँ मोक्ष भी एक 'मार्केटिंग' का विषय है और परलोक एक 'प्रोजेक्ट'। ये ज्ञानी जन भले ही कहें कि विषयों को छोड़ दो, पर स्वयं विषय-राग के ऐसे कुशल खिलाड़ी हैं कि एक ही पौराणिक कथा के विषय को हज़ारों बार चबाकर उसका ऐसा रस निकालते हैं कि सुनने वाला 'विषय-मुक्त' होने के बजाय उसी के सम्मोहन में आकंठ डूब जाता है। वास्तव में, विषय के बिना न उनकी तालीम पूरी होती है, न उनकी गद्दी की प्रतिष्ठा। यदि नर्क का भय और स्वर्ग का लोभ विषय के रूप में न हो, तो भला किसका मुद्दा मुरझाएगा नहीं?

हे भोले संसारियों, इन धर्माचार्यों की शैली को समझो— वे तुम्हें विषय छोड़ने को कहते हैं ताकि तुम उनके द्वारा परोसे गए 'परम-विषय' के दास बन सको। वे तुम्हें डराते हैं कि विषय-भोग तुम्हें नरक ले जाएंगे, पर स्वयं उन्हीं विषयों के संदर्भों से अपनी डिग्रियां और उपाधियां अलंकृत करते हैं। ज्यों-ज्यों वे विषय की खाल खींचते हैं, त्यों-त्यों उनके भक्तों की भीड़ बढ़ती है। अगर कोई जिज्ञासु प्रश्न कर दे, तो उसे 'विषयानुकूल' न होने का उलाहना देकर चुप करा दिया जाता है। और यदि चर्चा में कहीं विषयांतर हो जाए, तो ये चतुर उपदेशक उसे बड़ी चतुराई से पुनः उसी खूँटे पर ले आते हैं जहाँ उनका वर्चस्व सुरक्षित हो। उनके इर्द-गिर्द तैरते हुए ये विषय दरअसल छप्पन भोगों के समान हैं— कभी वे शांति का विषय परोसते हैं, तो कभी भय का, पर अंततः सार वही है कि बिना विषय के उनकी दुकानदारी और तुम्हारा उद्धार दोनों ही असंभव हैं।

इन गुरुओं और धर्माचार्यों के लिए 'विषये पानी पैठ' का अर्थ बड़ा गहरा है। वे जानते हैं कि जब तक भक्त को किसी न किसी विषय में उलझाए रखा जाएगा, तब तक वह संशय नहीं करेगा। बोलने का तौल, खोजने का ढंग और वैराग्य को ढोने का मसला— सब कुछ एक सुनियोजित विषय ही तो है। वे संसार को मिथ्या कहते हैं, पर उसी मिथ्या संसार के विषयों पर महाग्रंथ लिख डालते हैं। जिसे वे 'माया' कहते हैं, वह भी तो एक विषय ही है जिसे वे बड़ी बारीकी से नुचते और नोचते हैं। तनिक विचार कीजिए, यदि जगत में विषय न होता, तो क्या कोई आश्रम खड़ा होता? क्या कोई माला जप की जाती? विषय है तो संदर्भ है, और संदर्भ है तो चढ़ावा है।

अतः हे साहित्य और सत्य के खोजी अनुयायियों, इन धर्माचार्यों के इस विरोधाभास को ही इस संसार का असली सार समझो। वे तुम्हें त्याग का पाठ पढ़ाते हुए स्वयं जिस विषय-रस में डूबे रहते हैं, वही असली 'विषयानुकूल' जीवन है। विषयों से बचना एक भ्रम है, इसमें पूरी तरह डूबकर ही तुम जान पाओगे कि जिसे दुनिया विष कहती है, वही दरअसल इस जीवन का एकमात्र अमृत है। चाहे वह धर्म का विषय हो या कर्म का, जब तक खाल के बाल नुचेंगे, तब तक ही महफ़िल की रौनक बनी रहेगी। विषय ही वह धुरी है जिस पर आस्था और अर्थ दोनों नाच रहे हैं। इस सत्य को स्वीकार करना ही सबसे बड़ी वैराग्य की डिग्री है कि विषय के बिना न कोई ज्ञान है, न कोई मान है और न ही कोई भगवान है।

-राजेन्द्र मोहन शर्मा 
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