आलू : एक दारुण कथा | व्यंग्य

रचनाकार: परवेश जैन 

किसी समय आलू एक साधारण सब्ज़ी था। मिट्टी में जन्म, मिट्टी में जीवन और कढ़ाही में मोक्ष।

लेकिन यह कहानी उस साधारण आलू की नहीं है। यह कहानी है उस आलू की जो सिस्टम में घुस गया।

आलू का जन्म अब खेत में नहीं होता। उसका जन्म सरकारी फाइल के पेज नंबर 3 के पैरा 4 में होता है।

“प्रस्तावित आलू योजना—
गरीब, मध्यम और अमीर तीनों के लिए समान रूप से अनिवार्य।”

किसान बोता है, पर आलू पैदा करता है नीति आयोग।

बचपन में आलू मिट्टी से लथपथ रहता है। उसे पता नहीं होता कि वह सब्ज़ी है। वह सोचता है, “मैं तो बस एक गोल विचार हूँ।” मंडी में पहुँचते ही उसे उसकी औकात बता दी जाती है।

“छोटा है— सस्ता।” “बड़ा है— शक़ी।” “अजीब आकार है।  काटकर बेचना पड़ेगा।” 

एक दिन एक नेता मंडी में आया। उसने आलू उठाया, मुस्कराया और बोला, “यही है आम आदमी की सब्ज़ी।” तभी से आलू आम नहीं रहा। वह भाषण में घुस गया। नारे में बदल गया।

और थाली से चुनाव तक पहुँच गया। नेता बोला, “अगर महँगाई बढ़े तो समझिए आलू रो रहा है।”

किसी ने नहीं पूछा— आलू खा कौन रहा है?

मीडिया ट्रायल और टीवी डिबेट में एंकर चिल्लाया, “आलू राष्ट्रविरोधी है या नहीं?” पैनल में बैठे लोग
आलू को देखे बिना उसकी नीयत पर चर्चा कर रहे थे।

एक बोला, “आलू विदेशी नस्ल का है।”

दूसरा बोला, “नहीं, आलू हमारे संस्कारों में है।”

आलू चुप था। क्योंकि सब्ज़ियों को बोलने का अधिकार नहीं होता।

सोशल मीडिया ने आलू को मीम बना दिया। “आलू जैसी सोच।” “आलू दिमाग।” “देश आलू से नहीं चलेगा।” आलू पहली बार आहत हुआ। क्योंकि उसे हमेशा खाया गया था, अपमानित नहीं।

आलू ने आत्ममंथन कर सोचा “मैं हर सब्ज़ी में हूँ। हर थाली में हूँ। फिर भी मैं सबसे सस्ता क्यों?” यह प्रश्न किसी मंत्री ने नहीं सुना। घर की रसोई में आलू की हैसियत स्पष्ट है। “कुछ नहीं है—आलू बना लो।” आलू समझ गया वह समाधान है, पर सम्मान नहीं।

जहाँ भी संकट आता है, आलू आगे कर दिया जाता है। महँगाई— आलू। भूख— आलू। अनुदान— आलू बाक़ी सब्ज़ियाँ सिस्टम में महँगी हो जाती हैं।

कुछ लोग बोले “आलू व्रत में चलता है।” कुछ बोले, “नहीं, यह विदेशी है।” आलू को अब अपने भगवान पर भी संदेह होने लगा।

आलू को प्याज़ से प्यार हो गया। लेकिन समाज बोला, “यह मेल नहीं खाता। प्याज़ आँसू लाता है, आलू आलस।” दोनों को एक ही कढ़ाही में मार दिया गया।

एक दिन आलू ने तय किया, “अब मैं चुप नहीं रहूँगा।” वह भाषण देने गया। लेकिन मंच पर लिखा था “सब्ज़ियों का प्रवेश निषेध।”

अंततः आलू मरा नहीं। वह उबल गया। तला गया कुचला गया। और प्लेट में पड़ा तो किसी ने कहा “कुछ खास नहीं है।”

आलू की कथा दारुण है क्योंकि वह हर जगह है फिर भी कहीं नहीं। वह ज़रूरी है, पर सम्मानित नहीं।

आलू सब्ज़ी नहीं है। वह व्यवस्था का प्रतीक है। जो हर जगह फिट हो जाए, वही सबसे ज़्यादा कुचला जाता है। जिस दिन आलू ने सवाल पूछना सीख लिया, उस दिन रसोई से संसद तक आग लग जाएगी।

इसलिए आलू को उबलने दो।

-परवेश जैन