नशे में कौन नहीं है | व्यंग्य आलेख 

रचनाकार: रणविजय राव 

रामखेलावन की गाड़ी मतलब उसकी जिंदगी की गाड़ी अपनी गति से चल रही थी। कब सुबह हुई, सुबह से दोपहर और दोपहर से शाम, फिर रात और कब नींद के आगोश में चला गया वह, उसे होश नहीं होता था। सब काम नियमानुसार चल रहा था। फुलमतिया ने जो नियम अर्थात जो दिनचर्या निर्धारित कर दी थी, रामखेलावन को बस उसे फॉलो करना होता था। और फॉलो करने में ही उसकी भलाई भी थी। सब कुछ शांति से चल रहा था। तभी अचानक जैसे ठहरे हुए पानी में किसी ने पत्थर फेंक दिया हो। जैसे अचानक बम विस्फोट हो गया हो और दीवार पर टंगी छत धड़ाम से उसके सिर पर आ गिरी हो। अचानक रसोई से बर्तन गिरने, पटकने-पटकाने की तेज आवाज आने लगी। 

उसे भला क्या पता था कि उसके जीवन में यह जो शांति थी, वह तूफान के आने के पहले की शांति थी। यह महज इत्तफाक था या कि झटका, उसे कुछ इस प्रकार लगा था कि उसका दिमाग सन्न रह गया था। 

दरअसल हुआ यह था कि निर्धारित नियमानुसार उसे सुबह-सुबह बर्तन धोकर और चाय बनाकर अपनी बीवी फुलमतिया के साथ चाय की चुस्कियों के साथ अखबार पलटने का समय था। और वह व्हाट्सऐप पर किसी महिला मित्र की जिज्ञासाओं को शांत करने में मशगूल था। इसी दौरान वह मंद-मंद मुस्कुरा भी रहा था। यह सब देखकर फुलमतिया से रहा नहीं गया और वह जली-कटी सुनाने लगी। रसोई में जाकर बर्तन-भांडे पटकने लगी। और जोर-शोर से चीखने लगी, "पता नहीं तुम किस चीज के नशे में रहते हो। अपना जरूरी काम भी भूल जाते हो। तुम्हें अपनी जिम्मेदारियों का जरा भी एहसास नहीं। मैं तुम्हारा सारा नशा उतार दूंगी।" 

बेचारे बेचारा रामखेलावन को तो जैसे सांप सूंघ गया। जैसे काटो तो खून नहीं। सोचने लगा कि कैसी औरत है। यही बात वह आराम से भी कह सकती थी। भला कौन-सा ऐसा गुनाह-ए-कत्ल कर दिया था मैंने, जिसकी जमानत नहीं मिल सकती थी। और नशे की बात...? भला मैं किस बात के नशे में रहता हूं, यह तो मुझे भी नहीं पता। सत्ता के नशे में चूर नेता की हालत जैसी होती है न चुनाव हार जाने के बाद, ठीक वही स्थिति अभी रामखेलावन की थी। 

खैर, आज रामखेलावन का मूड ऑफ है। दिमाग में तरह-तरह की बातें चल रही हैं। वह इसी निष्कर्ष पर पहुंचा है कि आजकल भला कौन नहीं है नशे में। किसी को दौलत का नशा है तो किसी को प्यार का नशा है। किसी को शराब का नशा है तो किसी को शबाब का। किसी को पढ़ने का नशा है तो किसी को मौज करने का। किसी को अपने भ्रष्ट आचरण का ही नशा है तो किसी को अपनी ईमानदारी का। सत्ता का नशा तो और भी जबरदस्त है। खेलने-खाने की, पीने-पिलाने की, मिलने-मिलाने का और न जाने लोग किस-किस के नशे में डूबे हैं। ऐसे में यदि मैं भी नशे में हूं तो क्या गलत है भला। 

रामखेलावन इसी सोच में डूबा है कि नशा करना गलत कैसे है आखिर? इस बौड़म फुलमतिया को कौन समझाए। आज तो जैसे सब के सुर बिगड़े हुए हैं। और हर लफ़्ज़ बीमार है। किसी पर "मय" का नशा छाया हुआ है तो कोई "मैं" के नशे में है। 

और जहां तक शराब के नशे की बात है तो इससे अच्छा तो और कुछ है ही नहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो जहां बचाने की आफत जहां जान बचाने आन पड़ी है, सारी दुकानें बंद हैं, फिर भी सरकार शराब की दुकानें क्यों खोल रही है? क्योंकि शराब की दुकानें बंद तो सरकार की आमदनी भी बंद। यह अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। देश के राजस्व का बहुत बड़ा स्रोत है। 

रामखेलावन को तो यह भी लगता है कि देश में दो ही वर्ग हैं - 'एक पीने वालों का' और दूसरा 'न पीने वालों का'। पीने वालों को देश की चिंता है, अर्थव्यवस्था की चिंता है, रोटी-रोजगार की चिंता है, घर-परिवार की चिंता है। उन्हें सबकी चिंता है। सच्चे मायने में वे देशभक्त हैं। और न पीने वालों को देश की चिंता नहीं। उन्हें तो बस अपनी और अपने परिवार की चिंता है। देश से हो रही अपनी गाढ़ी कमाई को भी वे खर्च नहीं कर रहे। पूंजी जमा कर रहे हैं। जमाखोरी के मामले में उन्हें तो जेल में होना चाहिए। 

अर्थशास्त्र का यह नियम है कि पब्लिक की जितनी ज्यादा परचेजिंग कैपेसिटी होगी, अर्थव्यवस्था के लिए उतना ही अच्छा होगा। पर यह न पीने वालों के भेजे के बाहर की बात है। 

न पीने वाले लोग अक्सर शराब को दोष देते हैं। पीने वालों को ही समस्या की जड़ में देखते हैं। उन्हें यह नहीं पता कि समय बेशक बदल जाता है, पर जुर्म वही होता है। बस किरदार बदल जाते हैं। सत्ता आज भी सरेआम नीलाम हो रही है और कीमत भी वही है। बस ठेकेदार बदल जाता है। समझने का माद्दा होना चाहिए। और जो न समझे वो अनाड़ी है। 

साफ बात है यही है कि पीने का अर्थ है कि वह आम ज़िंदगी में 'पॉजिटिव' है और न पीने वाला 'नेगेटिव'। चंद पुराने लोग बेशक पीने को भला-बुरा कहें, ताने मारने लगें, वैसे तो आनंद-ही-आनंद है। पीने वाला भी खुश, पिलाने वाला भी खुश और पीते हुए देखने वाला भी खुश। 

रामखेलावन यही सोच रहा है कि आदमी पैसे का दास बन गया है। धर्म, समाज और राजनीति - तीनों "अर्थ से" संचालित हो रहे हैं और दूषित हो चुके हैं। हम सबको 'अर्थ' के इस प्रमाद से, अर्थ के इस नशे से बचना चाहिए। ऐसे में तो लोग पीने को नाहक ही बुरा कहते हैं। हमें 'न पीने वालों' के इस "एकाधिकारवाद" को तोड़ना चाहिए। उन्हें भी यह समझना चाहिए कि जब जमीन-जायदाद किसी की नहीं रही, जब संपत्ति किसी के पास इकट्ठा नहीं रह सकी, तो क्या पेट काट-काट कर बचाया गया एक-एक पैसा बचेगा क्या भला? नहीं न...। इसलिए हमें इस एकाधिकारवादी प्रवृत्ति से बचना चाहिए। 

रामखेलावन के दिमाग में बड़े बच्चन साहब भी याद आ गए, जब वह कहते हैं--

बैर बढ़ाते मंदिर-मस्जिद, 
           मेल कराती मधुशाला।।

सारे भेदभाव हम भूल जाते हैं मयखाने में बैठते ही। समाजवाद का इससे बड़ा और बढ़िया एग्जाम्पल भला और कहां मिलेगा। 

न पीने वाले हालांकि सारे वैसे नहीं होते हैं। रामखेलावन तो साफ कहता है, "हां मैं पीता हूं। और मुझे नहीं आती उड़ती पतंगों-सी चालाकियां की गले मिलकर भी गला काट दूं। शराब की एक घूंट क्या लगाई वह अपने लबों से, उसे समझ आ गया कि इससे भी कड़वी तो जमाने की सच्चाई है, जहां झूठ है, फरेब है, बेईमानी है और मक्कारी है।” 

प्यार के नशे के भी अपने ही जलवे हैं। कुछ नशा तो बात का होता है और कुछ असर पहली मुलाकात का। और नशा इस कदर छा जाता है कि सांस भी लो तो उसी प्रेयसी की याद आती है। रामखेलावन के दोस्त दीनदयाल के मन में हर बार आती है यह बात कि छोड़ देगा वह पीना अब से।  मगर जैसे ही अपने प्रेयसी की याद आती है, वह चल पड़ता है मयखाने की ओर। 

इसलिए यह जो नशा है और इसका जो आनंद है, वह न पीने वाले भला क्या जाने! दिल की धड़कनों का शोर कितना ज्यादा है सीने में, यह शोर उसके सिवा कोई नहीं सुन सकता। 

तभी तो मैं कहता हूँ मित्रो कि कौन नशे में नहीं है भला। इसके लिए सिर्फ पीने वालों को दोष देना ठीक नहीं। सभी अपनी-अपनी तरह के नशे में हैं और सबके अपनी-अपनी तरह के आनंद हैं। यह ऐसा नशा है, ऐसा अजब खुमार है कि कोई पर्दे में करता है और कोई सरेआम करता है। 

नशे की झोंक का सबब यह है कि रामखेलावन को यह एहसास हो रहा है आज कि वह अपनी जिंदगी के सारे महंगे सबक सस्ते लोगों से ही सीखा है विशेषकर तब जब वह नशे में होकर भी नशे में नहीं होता।

--रणविजय राव