निराला के प्रति | निराला पर व्यंग्य कविता

रचनाकार: विनोद शर्मा

जब हिंदी और हिंदुस्तानी का विवाद जोरों पर था, निरालाजी को हिंदुस्तानी जबान में कविता लिखने का शौक पैदा हुआ, और उन्होंने तथाकथित 'हिंदुस्तानी' में कुछ कविताएँ लिखीं और उनका संग्रह 'कुकुरमुत्ता के नाम से छपवा भी दिया।

यदि वे और किसी समय हिंदुस्तानी में कविता लिखते तो शायद लोग ध्यान भी न देते, किंतु उस विवादपूर्ण वातावरण में उनके समान प्रांजल और संस्कृतनिष्ठ हिंदी में लिखनेवाले एक शीर्षस्थ कवि का 'हिंदुस्तानी' में लिखना बहुत से लोगों को अच्छा नहीं लगा।

कुछ लोगों को ऐसा मालूम पड़ा कि जैसे उनके दल का एक सेनानी शत्रु के शिविर में चला गया हो। किंतु निरालाजी उनके सुहृद मित्रों में थे और उनसे संबंध इतनी आत्मीयता के थे कि खुलकर उनका विरोध करना भी संभव नहीं था। लोग जानते थे कि उनका हृदय कहाँ है, किंतु उस समय वे अपनी झोंक में एक धारा में बह गये थे। फिर भी आवश्यक था कि उन्हें यह बतला दिया जाए कि उनका यह हिंदुस्तानी-प्रेम लोगों को पसंद नहीं आया। अतएव यह 'कविता' लिखी गयी। इसमें निरालाजी के व्यक्तित्व की कम, किंतु कृतित्व की अधिक आलोचना है। यह उनका एक प्रकार का मूल्यांकन है। एक दिन विनोद शर्मा ने यह कविता निराला को सुना भी दी। या तो एक मित्र की आलोचना का प्रभाव था, या तब तक उनकी हिंदुस्तानी की झक ही समाप्त हो गयी हो, कुछ भी कारण हो, इसके बाद निराला फिर प्रकृतस्थ होकर अपनी सामान्य भाषा में कविता लिखने लगे ।


हे मुक्तकेशी!
हे अस्तव्यस्त वेशी! 
वज्रघोष से हे प्रचण्ड आतंक जमाने वाले!
कविता-कामिनि को--
कठपुतली का सा नाच नचाने वाले!

हे निबंध! 
छन्द, स्वच्छन्द 
भाव की गुड़ी की डोर है तुमने दी ढोल, 
पर
हे कलाकार! 
फिर भी तुम्हारी कृति के हैं दुरुस्त--
सब काँटे और कील।

हे उद्दाम! 
जब चली वेगवती धार--
कविता की तुम्हारी,
तब 
छन्दों के किनारों को,
तुकों की कगारों को 
प्लावित कर,
तोड़ कर 
फोड़ कर 
पर्वत छन्द शास्त्र के, 
निकली कविता की धार नये नये प्रान्त में।

तब नवीन दृश्य, 
और नूतन वनस्पति, 
नये नये पुष्प,
और नयी नयी कलिकाएँ 
चित्रित लगी करने वह तूलिका तुम्हारी 
जो आके पाणि पल्लव में 
कुशल कलाकार के 
हो गयी धन्य, 
पा तुमसा न अन्य!

चकित रह गया, 
स्तम्भित रह गया,
अवाक् रह गया 
स्तब्ध रह गया सारा साहित्य-लोक, 
यद्यपि कठिन था उसके लिए
सँभालना वह झोंक--
मौलिकता की,
प्रतिभा की, 
कलाकार की कुलशता की।
कह उठी जनता 
आ रोब में तुम्हारे तब, 
'हिंदी का यही युगप्रवर्तक एक कवि है!'

छोड़ दी कगार, 
और छोड़ा था किनारा भी, 
किन्तु धरती तो थी वही बूढ़े भारत की।*
जल भी पुनीत वही 
जोकि संस्कृत-शिव-शैल की हिम की चट्टानों के गलने से बना था।
इससे ही 
काव्य के भगीरथ! 
तुम हिन्दी को दे सके--
'राम की शक्ति-पूजा' 
'यमुना के प्रति' 
और 
अनुपम वह 'तुलसीदास,' 
तथा 
अन्य कितने गीत भी।

किंतु निर्बन्ध! 
जब हुई तुम्हारी स्वच्छन्दता और भी स्वच्छन्द, 
और पुण्यतोया धार में 
तुमने मिलाया गन्दा नाला हिन्दुस्तानी का, 
तबसे तुम हुए हो महान 'कुकुरमुत्ता' समान!

-विनोद शर्मा