कीति तुम्हारी इस तरह, हो जग में विख्यात।
मह मह महके जिस तरह, बासमती का भात॥
दग्ध हृदय रो रो हुआ, और अधिक बेहाल।
जलते तावा पर दिया, मानो पानी डाल॥
वेणी उनकी देखिए, लम्बी ललित ललाम।
जैसे कोई वाक्य हो जिसमें न हो विराम॥
सुन्दर भी, वय भी नई, किन्तु न यौवन ताप।
बिना नमक जैसे बना, हो आलू का चाप॥
ऊँचे पद पर यदि नहीं, दिये गये तुम ठेल।
क्यों उदास हो? कब गये, दो दिन को भी जेल?
मीठी वाणी का भला, कैसे हो आभास।
शक्कर का मुख में नहीं, बेढब कभी निवास॥