मानव होली में मन का मैल जला दो!
गंगा-जल-सा पावन मानव का जीवन,
जिसके चरणों की रज धोता है सावन।
निज सांसों में जो मुक्ति बांधकर लाया,
जो तूफानों में भी रहकर मुसकाया।
ऐसे जीवन को कलुषित करनेवाली,
ममता को निज होली में आज जला दो।
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केसर, कस्तूरी, रंग-बिरंगी रोली,
भर कहां सकी है मानवता की झोली।
कोकिल छिप-छिप कर अमराई में बोली,
मानव ने मानव की जंजीरें खोलीं।
आजाद मनुज, परतंत्र मनुज की बेड़ी,
तुम तोड़ तोड़ होली में आज जला दो!
-रमानाथ अवस्थी