उलाहना

रचनाकार: गंगाप्रसाद पाण्डेय

दिया अंधेरी रातें मुझको 
शुभ्र चांदनी और किसी को, 
यही तुम्हारा दान; 
प्राण मैं समझ गया हूँ!

तुम रूठो मैं खूब मनाऊँ 
मैं रूठूं तो मूर्ख कहाऊँ, 
यही तुम्हारा मान; 
प्राण मैं सुलझ गया हूँ!

तुम चाहो जो करो भला है 
मेरी सभी कला विकला है, 
यही तुम्हारा ध्यान; 
प्राण मैं उलझ गया हूँ!

सभी तरह अधिकार तुम्हारा 
मेरे लिए न शेष सहारा, 
यही स्नेह संधान, 
प्राण मैं बिलझ गया हूँ!

-गंगाप्रसाद पाण्डेय
       [1948]