सब गुरूजन को बुरी बतावै,
अपनी खिचड़ी अलग पकावै।
भीतर तत्व न झूठी तेजी,
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेजी॥
भीतर भीतर सब रस चूसै,
हँसि हौस के तन मन धन मूसै।
जाहिर बातन मैं अति तेज,
क्यों सखि सज्जन नहिं अँगरेज॥
रूप दिखावत सरबस लूटै,
फंदे मैं जो पड़े न छूटै।
कपट कटारी जिय मैं हुलिस,
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि पुलिस॥
तीन बुलाए तेरह आवैं,
निज निज बिपता रोइ सुनावैं।
आँखौ फूटे भरा न पेट,
क्यों सखि सज्जन नहिं ग्रैजुएट॥
धन लेकर कछु काम न आव,
ऊँची नीची राह दिखाव।
समय पड़े पर सीधै गूंगी,
क्यों सखि सज्जन नहिं सखि चुंगी॥
