सबसे बड़ी शोक कथा | सुनी-सुनायी

रचनाकार: दुर्गाशंकर त्रिवेदी

हरिशंकर परसाई अपने जीवन की एक करुण कथा सुनाते समय आंसुओं से भीग उठते थे। लंबी सिसकियां ले-लेकर उसे सुनाते थे। वह कथा इस प्रकार से है--"मेरी माताजी के हम दो जुड़वां बच्चे पैदा हुए थे। मैं भी उनमें से एक था हजरात। हम दोनों की शक्ल आपस में मिलती-जुलती थी कि कभी-कभी तो हमारी अम्मीजान भी धोखा खा जातीं। जब हम छोटे थे तब एक दिन दोनों ही अपने बगीचे के होज के पास खेल रहे थे। इतने में हममें से एक पैर फिसलने से होज में गिर गया। आसपास कोई भी नहीं था उस वक्त जो उसे बचा लेता, इसलिए वह मर गया।"

कुछ देर रुककर सिसकियां भर वे बोले--"हां, तो थोड़ी देर में हमारी मम्मी वहां आ गयीं। किंतु उसकी समझ में यह नहीं आ सका कि असल में हम दोनों में से मौत किसकी हुई है। दोस्तो, आज भी लोगों को यह रहस्य मालूम नहीं हो सका है। कितने लोगों का खयाल है कि मैं जीवित हूं और मेरा भाई मर चुका है। लेकिन असल में उनका यह सोचना गलत है। असल में उस वक्त होज में गिरकर मैं ही मरा था और जो जीवित है, वह मैं नहीं, बल्कि मेरा अपना भाई है। यही मेरे इस छोटे से जीवन की सबसे बड़ी शोक कथा है कि में झूठमूठ ही अपने आप को जीवित कहकर लोगों को धोखा दे रहा हूं। हरिशंकर परसाई जैसा हास्य-व्यंग्य लेखक बनकर न जाने किन-किन पर रंदा चला रहा हूं।"

 ...और वे फिर सिसकियां लेकर रो उठते हैं। लोग कहकहे लगा उठते हैं, ठहाके गुंजा देते हैं।