आज 15 मार्च, 2088 की दुपहरी में हमारे शहर के अण्डरग्राउड कंप्यूटर सेण्टर पर काम करने वाले कई स्वयंचालित रोबोट अचानक एक साथ शोर मचाने लगे। इस शोर के कारण कई शार्टसर्किट वाले रोबोटों का तो सारा सिस्टम ही क्षतिग्रस्त हो गया। मिनटों में प्रशासन को पता चल गया कि कंप्यूटर सेण्टर के उपद्रवी रोबोटों ने एक दूसरे पर लुब्रिकेटिंग आयल का छिडकाव किया, जिसके फलस्वरूप राष्ट्रीय आय में 00.6489 प्रतिकोण की क्षति हुई। शारजाह मे जन्मी नीली आँखों वाली एक रोबोट कुमारी पर भी इस हलचल का असर देखा गया। उसने अपनी तमाम सहेलियों पर विक्षिप्ततावस्था के इस दौर में पालीथीन के अंडाकार गुब्बारे फेंके, जिनमें राशनकार्ड पर इशू करने के लिए मानव को परिशुद्ध कर बनाया गया जीवनरक्षक जल भरा हुआ था। दूरभाष के सुपर एक्सचेंज में तो कुछ रोबोट अपने साथ काम करने वाली मादा रोबोट से छेडखानी करने पर आमादा हो गये। मैन्युफैक्चरिंग डिफेक्ट के कारण दाहिने पैर से जरा लंगड़ाकर चलने वाले एक बाईस वर्षीय रोबोट ने हलचल के इस दौर में ऐसी छलांग लगाई कि अपने तमाम पुर्जे तोड बैठा और उसे राष्ट्रीय रोबोट निगम के कूडेखाने में पहुंचाया गया।
इन सारी गड़बडियों के तुरन्त बाद नगर प्रशासन की एक आपात-कालीन बैठक हुई। बैठक के पहले ही सुपर कंप्यूटर से इन विसंगतियो के कारण की जानकारी ली गई। सुपर कंप्यूटर ने बताया कि अब से सौ साल पहले इसी दिन हिन्दुस्तान में होली नाम का एक त्यौहार मनाया गया था। उसी अतीत का एक झोंका शहर के कुछ इलाक़ों में घुस आया और इतनी सारी तबाही मचा गया। इस तबाही पर विचार-विमर्श के लिए हुई बैठक में करीब चालीस प्रबुद्ध नागरिकों को प्रशासन ने आमंत्रित किया। इनमें सोलह तो रोबोट ही थे। बैठक की अध्यक्षता भी एक रोबोटं ने ही की, क्योंकि उसके बुद्धि अंक सर्वाधिक थे।
अध्यक्ष-रोबोट ने यह मूलभूत सवाल उठाया कि होली किसे कहते है? सभा में मौजूद रोबोट एक दूसरे का मुंह देखने लगे, क्योंकि सभी पच्चीस साल से भी कम उम्र के होली से अपरिचित यंत्र-मानव थे। बैठक में एक बूढ़ा आदमी भी था करीब साठ साल का। उसने अध्यक्ष रोबोट के पास अपना टेलीपैथिक संदेश भेजा कि वह होली के बारे में कुछ कह सकता है।
अध्यक्ष की अनुमति पाकर बूढ़ा आदमी कहने लगा--'दोस्तों! अपने बचपन में हमने सुना था कि होली के दिन हिन्दुस्तान के लोग एक दूसरे पर रंग और अबीर फेंका करते थे। हमारे डैडी ने बताया था कि लोग सड़कों से गुजरते थे, तो बच्चे बाल्टियों में रंग उनके ऊपर गिराते थे। हर मर्द-औरत होली के रंगों में सराबोर रहते थे। हमने भी अपनी जवानी के दिनो में चम्मचों-कटोरियो में रंग भरकर मुहल्ले की भाभियों को भिगोया था। अब तो वह सब सम्भव ही नहीं हैं। हर इतवार को एक लीटर पानी सप्लाई होता है आजकल, लेकिन अब से सौ साल पहले लोग...।
सभा में मौजूद लोग चकित भाव से मुंह बाये यह सब सुन रहे थे। एक प्रतिभाशाली रोबोट से नहीं रहा गया तो वह बोल उठा--'हद हो गई, पहले का आदमी कितना पानी बर्बाद करता था?'
बूढ़े आदमी ने कहा--'यही नहीं, आपको यह जानकार और भी अचम्भा होगा कि उस जमाने के लोग होली के दिन दूध और चीनी के बने तरह-तरह के पकवान खाते थे। इन दिनों चीनी के कैप्सूल मिलते हैं, जबकि सौ साल पहले चीनी बाजार में आठ रुपये में हजार ग्राम मिलती थी। चालीस रुपये में हजार ग्राम चीनी तो हमने भी खरीदी थी अपनी जवानी में। चीनी के साथ दूध मिलाकर...।'
बात को बीच मे ही काटते हुए एक युवा आदमी ने पूछा--'दूध? उसी दूध का जिक्र कर रहे हैं जिसे हम अपने राशन कार्ड पर दस बूंद प्रति यूनिट प्रतिदिन पाते हैं?'
'हाँ वही दूध !'--बूढे आदमी ने कहा--'उसी दूध का खोआ बनाया जाता था, उससे तरह-तरह की मिठाइयां बनती थी। एक जमाने मे चावल और दूध-चीनी मिलाकर खीर बनती थी, जिस पर केसर और इलायची...।'
एक रोबोट ने बीच में ही यह मौलिक प्रश्न किया कि यह इलायची क्या चीज होती है? बूढ़े आदमी ने सूचित किया कि राजधानी के राष्ट्रीय संग्रहालय के खानदान प्रकोष्ठ में इलायची का एक दाना सुरक्षित रखा है, जिसका दर्शन किया जा सकता है। सभा के अध्यक्ष ने होली के बारे मे कुछ और जानकारियां चाही, तो बूढ़े आदमी ने होलिका जलाये जाने का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि सौ साल पहले लोग शहर के चौराहे पर घर का कूड़ा एकत्र कर उसमें आग लगाते थे और चारों ओर से उसे तापते थे। उन्होंने यह भी सूचित किया कि होलिका दहन की यादगार में उनकी उम्र के बूढ़े लोग अपने गैस लाइटर को जलाकर ताप लिया करते हैं। इस जानकारी ने नई पीढी को बेहद उत्तेजित कर दिया। एक नौजवान ने तो यह अफसोस जाहिर किया कि पुराने जमाने के लोग अपनी मूर्खतावश ऊर्जा के सबसे महान स्रोत कूड़ा-करकट को बुरी तरह नष्ट करते रहे। एक युवा रोबोट ने इस आशय का कानून बनाने का सुझाव दिया, जिससे होली के नाम पर बूढ़े गैस बर्बाद न करें।
2088 के प्रबुद्ध नागरिकों की सभा के अन्त में होली मनाने की सौ साल पहले की परम्परा की तहेदिल से भर्त्सना की गई। आशा व्यक्त की गई कि देश के होनहार वैज्ञानिक कोई ऐसी तरकीब निकालेंगे जिससे होली जैसी पुरानी रूढ़ियों की हवा वायुमण्डल को दूषित न कर सके। उन सारे नर और मादा रोबोटों के खिलाफ 'कारण बताओ' नोटिस तत्काल जारी किया गया, क्योकि अनुशासन ही देश को महान बनाता है--होली नहीं ।
- बालेन्दु शेखर तिवारी
[मेरी प्रिय व्यंग्य रचनाएं, प्रथम संस्करण 1988, प्रकाशक : राज पब्लिशिग हाऊस, दिल्ली]