मित्रो, मुझे साल भर राजभाषा पखवाड़े का वैसे ही इन्तज़ार रहता है जैसे काशी और गया के पण्डे को पितृपक्ष की प्रतीक्षा रहती है। जैसे-जैसे अगस्त का महीना बीतने लगता है और सितम्बर माह बस आने ही वाला होता है, मेरी प्रसन्नता, अकुलाहट और व्यग्रता बढ़ती जाती है। जैसे पण्डा अपने यजमान की राह देख रहा होता है, ठीक वैसे ही मैं भी छोटे, बड़े सभी विभागों और संस्थानों से टेलीफोन या मोबाइल की घनघोर प्रतीक्षा में लगा रहता हूँ।
मैं एक माह पूर्व से ही उन विभागों, संस्थानों के छुटभैये अधिकारियों और कर्मचारियों से बिना किसी कारण (कारण तो स्पष्ट है) अभिवादन तथा अनर्गल वार्तालाप आरम्भ कर देता हूँ और उन्हें राजभाषा के प्रचार-प्रसार के महती दायित्व का स्मरण भी दिलाता रहता हूँ।
जैसे-तैसे करके मैं पखवाड़े के पन्द्रह दिन के यजमानों की व्यवस्था करने में सफल हो ही जाता हूँ। यदि इस दुरूह कार्य के लिए मुझे कुछ व्यक्तिगत व्यय भी करना पड़े (चाय-पानी, चखना, शराब वगैरह) तो राजभाषा की सेवा के लिए मैं पीछे नहीं हटता। यह कहना अनुचित न होगा कि हिन्दी वैश्विक व्यापार की भी भाषा बनती जा रही है, अत: ऐसे कार्यक्रमों को पाने के लिए कुछ निवेश करने में क्या बुराई है। राजभाषा सेवा परमो धर्म:।
भूतकाल में पन्द्रह दिन के यजमान संस्थाओं का प्रबंध करना एक दुष्कर कार्य होता था, परंतु अब बहुत सी भाषा सेवी संस्थाओं और भाषा स्वयंसेवक मित्रों (दलालों) के कारण यह कार्य अत्यंत सरल हो गया है। एक दो महीने पूर्व से ही ऐसी हितैषी और परोपकारी संस्थाओं अथवा स्वयंसेवकों से व्हाट्सऐप तथा ई-मेल प्राप्त होने लगते हैं जिसमें सेवा (दलाली) की फीस और शर्तों के साथ-साथ हर स्तर के विभागों, संस्थानों में होने वाले कार्यक्रमों की गोपनीय जानकारी बड़े विस्तार से दी जाती है। अब जैसी आपकी श्रद्धा, सामर्थ्य और पहुँच, आप उसी हिसाब से अपने पसन्द के कार्यक्रम में ससम्मान, सादर शामिल हो सकते हैं।
मैं तो कहता हूँ सरकार को इस दुरूह प्रक्रिया के सरलीकरण पर ध्यान देना चाहिए और हम जैसे साहित्य सेवियों को पखवाड़े के दौरान कार्यक्रम दिलाने की गारन्टी देनी चाहिए। राजभाषा के प्रचार-प्रसार के लिए हर माह कम से कम एक राजभाषा पखवाड़ा मनाया जाए, ऐसा संविधान में संशोधन कर कानून पारित कर देना चाहिए और इस कानून का पालन न करने पर घनघोर दण्ड का प्रावधान होना चाहिए।
कभी-कभी राजभाषा पखवाड़े की जगह "राजभाषा माह" भी मनाना चाहिए। आखिर एक पखवाड़े में इतने बड़े देश में राजभाषा का प्रचार-प्रसार और उसकी सेवा कैसे संभव है।
मैं तो सरकार को सलाह देना चाहता हूँ कि "एम्प्लायमेन्ट एक्सचेंज" की तर्ज पर हम जैसे राजभाषा सेवियों का स्थायी पंजीकरण (परमानेन्ट रजिस्ट्रेशन) होना चाहिए ताकि विभिन्न विभाग वाले बिना अधिक श्रम किये हमें नियमित रुप से आमंत्रित करते रहें। ऐसी व्यवस्था से सभी का समय बचेगा।
मैं राजभाषा प्रेमियों का इस बात की ओर भी ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ कि जैसे पण्डे का ध्यान पूजा से अधिक दक्षिणा पर रहता है और वह फूल, अक्षत, कुमकुम आदि पर विशेष ध्यान नहीं देता, ठीक वैसे ही हम भी पुष्प-गुच्छ, श्रीफल, स्मृतिचिह्न और शॉल आदि पर विशेष ध्यान नहीं देते, बल्कि कार्यक्रम के अन्त में दक्षिणा अर्थात लिफाफे पर ही मनोयोग से ध्यान केंद्रित करते हैं।
बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि अब लोगों के राजभाषा सेवियों के प्रति आदरभाव और मूल्यों में काफ़ी गिरावट आ गई है। अभी पिछले सप्ताह ही विभिन्न कार्यक्रमों में मिले बहुत से शॉल को बेचने गया था तो दुकानदार प्रति शॉल पचास रुपये भी देने को तैयार नहीं था। राजभाषा सेवक का ऐसा अपमान असह्य है। सबसे हृदयविदारक अनुभव तो तब हुआ जब स्मृतिचिह्न के चांदी जैसे चमकते पतरों को उखाड़ कर बेचने गया तो दुकानदार ने न केवल मेरा उपहास किया बल्कि मेरे द्वारा अर्जित किए हुए सम्मान चिह्नों के पतरों को लोहे का डिक्लेयर करते हुए कौड़ी के भाव कहकर वहीं फेंक दिया, साथ ही धोखाधड़ी के इल्ज़ाम से भी सुशोभित किया।
इसे मैं अपना व्यक्तिगत अपमान नहीं बल्कि हम जैसे राजभाषा सेवियों का सामूहिक अपमान मानता हूँ। मैं तो कहता हूँ कि सस्ते शॉल और नकली, चाँदी जैसी दिखने वाले स्मृतिचिह्न भेंट करने जैसी ओछी हरकत को राजभाषा का सार्वजनिक अपमान माना जाए।
देश को इस पर कानून बनाना चाहिए और गेहूँ की तरह "मिनिमम सपोर्ट प्राइस" अर्थात 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' घोषित करना चाहिए ताकि कोई भी संस्था हमें न्यूनतम मूल्य से कम का शॉल तथा स्मृतिचिह्न न दे पाए। कानून की अवहेलना करने पर दंडात्मक कार्रवाई होनी चाहिए क्योंकि इससे राजभाषा अपमानित होने से बचेगी। ऐसे ऐतिहासिक कानूनी प्रावधान से राजभाषा की सीधी सेवा हो सकेगी और हम जैसे भाषा सेवी 'तन-मन-धन से सेवा' की कहावत को चरितार्थ करते हुए अपनी सेवा दे पाएँगे। यही न्यूनतम मूल्य का कानून और निर्देश दक्षिणा अर्थात लिफाफों पर भी लागू होना चाहिए।
मेरे विचार से राजभाषा के अधिकाधिक सेवा के लिए राजभाषा सेवियों के परिवारजनों के लिए "प्रधानमंत्री राजभाषा निश्चित रोज़गार योजना" होनी चाहिए और हर राजभाषा सेवक के परिवार से कम से कम एक व्यक्ति को सरकारी नौकरी प्रदान की जानी चाहिए। जैसे नेता का बेटा या बेटी नेता बनकर, अभिनेता का बेटा या बेटी अभिनेता बनकर, पीढ़ियों से देश और कला की सेवा कर रहे हैं, वैसे ही राजभाषा सेवक पुत्र अथवा पुत्री निश्चित रोज़गार योजना के तहत राजभाषा की कई पीढ़ियों तक सेवा कर पाएँगे। यदि ऐसा करना सरकार को दुष्कर लगे तो कम से कम हम जैसे राजभाषा सेवियों को एक पेट्रोल पंप अथवा राशन की दुकान या सरकारी शराब का ठेका देने का निर्णय सरकार द्वारा तत्काल योजना के तहत त्वरित रूप से लेना चाहिए।
राजभाषा के वैश्विक प्रचार-प्रसार के लिए मेरे मन में एक और ऐसी क्रांतिकारी योजना है जो मैं निस्वार्थ भाव से सरकार के ध्यान में लाना चाहता हूँ। सरकारी वजीफे के माध्यम से विदेश भ्रमण कर राजभाषा का सुदूर देशों में प्रचार-प्रसार करने के लिए सरकार द्वारा वर्ष में कम से कम दो बार राजभाषा सेवक और सेविकाओं का दल विदेश भेजा जाए। इस ऐतिहासिक कदम से विदेशों में भी हमारी राजभाषा फलेगी फूलेगी। इतिहास गवाह है कि सम्राट अशोक ने इसी विधि और व्यवस्था से तमाम देशों में बौद्ध धर्म का प्रचार प्रसार किया।
ऐसी बहुत सी योजनाओं पर मैं निस्वार्थ भाव से सरकार का ध्यान आकृष्ट करता रहूँगा, यदि सरकार मेरी अध्यक्षता में "एकल व्यक्ति समिति" (वन मैन कमिटी) गठित कर दे। इससे सरकार के समय और व्यय में भी भारी बचत होगी।
राजभाषा के सर्वांगीण विकास के लिए प्रतिबद्ध
एक राजभाषा सेवक
-सन्तोष कुमार झा
अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक