कभी तुम भी...
कभी तुम भी नज़र आओ
सुबह से शाम तक हमको
बहुत से लोग मिलते हैं
निगाहों से गुज़रते हैं
कोई अंदाज़ तुम जैसा
कोई हम नाम तुम जैसा
मगर तुम ही नहीं मिलते
बहुत बेचैन फिरते हैं
बड़े बेताब रहते हैं
दुआ को हाथ उठते हैं
दुआ में ये ही कहते हैं
लगी है भीड़ लोगों की
मगर इस भीड़ में
कभी तुम भी नज़र आओ
कभी तुम भी नज़र आओ...!!
मेरे अश्कों को...
मेरे अश्कों को पलकों पर,
मचलना भी नहीं आता
इज़हार-ए-ज़ब्त से मुझको,
निकलना भी नहीं आता
गए हो ऐसी राहों में
अकेला छोड़कर मुझको,
कि जिन पर ठीक से मुझको तो,
चलना भी नहीं आता
मुझे लगता है जैसे मैं
कोई, गम का सूरज हूं,
के जिसको शाम हो जाने पे,
ढलना भी नहीं आता
तुम्हारी बेरुखी एक दिन
उन्हें बर्बाद कर देगी,
जिन्हें नजरों से गिरकर
फिर संभलना भी नहीं आता
ना रहते मुंतज़िर तेरे
तो फिर हम और क्या करते,
हमें तेरी तरह रस्ते
बदलना भी नहीं आता...!!
-प्रोमिला दुआ
ई-मेल : duapromila@yahoo.com