नया वर्ष
किसी दरवाज़े पर
शोर मचाता हुआ नहीं आता
वह
धीमे क़दमों से
पुराने कैलेंडर के
आख़िरी पन्ने को
सहलाता हुआ
भीतर प्रवेश करता है।
उसके हाथों में
कोई घोषणापत्र नहीं
कोई आदेश नहीं
केवल
एक विनम्र-सी प्रार्थना होती है
कि
यदि चाहो
तो इस बार
थोड़ा और मानवीय
हो जाना।
पिछले वर्ष
हमने बहुत कुछ देखा
बहुत कुछ सहा
कुछ खोया
कुछ पाया
और बहुत कुछ
अनकहा
मन में ही
रह गया।
कई बार
हम सही होते हुए भी
कठोर हो गए
कई बार
गलत होते हुए भी
अडिग रहे
और कई बार
सिर्फ इसलिए
चुप रहे
क्योंकि
बोलना असुविधाजनक था।
नया वर्ष
हमसे कहता है
इस बार
शब्दों में
थोड़ी नरमी भर लेना
बहस में नहीं
संवाद में
विश्वास रखना।
इस बार
असहमति को
शत्रु न बनाना
और भिन्नता को
दूरी का कारण नहीं
समृद्धि का
अवसर मानना।
नया वर्ष
चाहता है
कि
हम
फिर से
सुनना सीखें
केवल उत्तर देने के लिए नहीं
समझने के लिए।
कि
हम
किसी की पीड़ा को
सलाह से नहीं
साथ से
हल्का करें
और किसी की खुशी को
ईर्ष्या से नहीं
आशीर्वाद से
स्वीकार करें।
इस बार
सौहार्द
किसी औपचारिक शब्द की तरह नहीं
हमारे व्यवहार की
स्वाभाविक भाषा बने।
घर के भीतर
पीढ़ियों के बीच
और बाहर
समाज के भीतर
एक पुल बने
जिस पर
आदर और स्वतंत्रता
दोनों
साथ चल सकें।
नया वर्ष
हमसे यह भी कहता है
कि
हम थोड़ा
क्षमा करना सीखें
दूसरों को भी
और स्वयं को भी।
क्योंकि
हर थकान
आलस्य नहीं होती
हर चुप्पी
अहंकार नहीं होती
और हर भूल
अपराध नहीं होती।
इस बार
हम
छोटी छोटी खुशियों को
टालें नहीं
किसी मुस्कान को
व्यर्थ न समझें
किसी हाथ को
खाली न लौटाएँ।
नया वर्ष
बड़े संकल्पों से नहीं
छोटे ,सच्चे
मानवीय प्रयत्नों से
सुंदर बनता है।
जब
हम बिना शोर किए
अच्छा करते हैं
जब
हम बिना दिखावे के
साथ निभाते हैं
तभी
वर्ष
वास्तव में
नया होता है।
आओ
इस नए वर्ष में
हम थोड़ा और
संवेदनशील हों
थोड़ा और सौहार्दपूर्ण हों
और बहुत अधिक
मानव हों।
क्योंकि
यही हर नए वर्ष की
सबसे सच्ची
कामना है।
-सुशील शर्मा