मुस्लिम शासन में हिंदी फारसी के साथ-साथ चलती रही पर कंपनी सरकार ने एक ओर फारसी पर हाथ साफ किया तो दूसरी ओर हिंदी पर। - चंद्रबली पांडेय।

मेरी औक़ात का...

 (काव्य) 
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रचनाकार:

 ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek

मेरी औक़ात का ऐ दोस्त शगूफ़ा न बना
कृष्ण बनता है तो बन, मुझको सुदामा न बना

ये हवाएँ कभी पत्थर भी उठा लेती हैं
अपना शीशे का मकाँ इतना भी अच्छा न बना

देख ! टूटे हुए तारे से मुहब्बत मत कर
और गिरती हुई दीवार को अपना न बना

कोई पक्षी मेरे आँगन में न उतरे दिनभर
मेरे भगवान ! मुझे इतना अकेला न बना

अपने ज़ख़्मों की नुमाइश तुझे करनी है तो कर
इल्तिजा है कि मेरे दुख का तमाशा न बना

- ज्ञानप्रकाश विवेक

 

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