राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है। - महात्मा गाँधी।

शब्द और शब्द | कविता

रचनाकार: विष्णु प्रभाकर | Vishnu Prabhakar
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समा जाता है
श्वास में श्वास
शेष रहता है
फिर कुछ नहीं
इस अनंत आकाश में
शब्द ब्रह्म ढूँढ़ता है
पर-ब्रह्म को

शब्द में अर्थ नहीं समाता
समाया नहीं
समाएगा नहीं
काम आया है वह सदा
आता है
आता रहेगा
उछालने को
कुछ उपलब्धियाँ
छिछली अधपकी

- विष्णु प्रभाकर

 

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