यदि पक्षपात की दृष्टि से न देखा जाये तो उर्दू भी हिंदी का ही एक रूप है। - शिवनंदन सहाय।

महीने के आख़री दिन  (कथा-कहानी)

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Author: राकेश पांडे

महीने के आख़री दिन थे। मेरे लिए तो महीने का हर दिन एक सा होता है। कौन सी मुझे तनख़्वाह मिलती है?  आई'म नोट एनिवन'स सर्वेंट! (I'm not anyone's servant!) राइटर हूँ।खुद लिखता हूँ और उसी की कमाई ख़ाता हू। अफ़सोस सिर्फ़ इतना है, कमाई होती ही नही। मैने सुना है की ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी बूंरंगस (boomerangs) यूज़  करते हैं, शिकार के लिए, जो के फेंकने के बाद वापस आ जाता है। मेरी रचनायें उस बूंरंग को भी शर्मिंदा कर देंगी। इस रफ़्तार से वापस आती हैं।

कल ही मैंने एक बहुत अच्छी कहानी लिखी। मैं तो हमेशा ही बहुत अच्छी कहानियाँ लिखता हूँ, पता नही क्यूँ एडिटर्स को पसंद ही नही आती! हो क्या गया है दुनिया के टेस्ट को? अभी पिछले हफ़्ते एक कॉमेडी पीस लिख के लोकल न्यूसपेपर को भेजा। एडिटर ने इस रफ़्तार से लौटाया उसे की गोरान इवानिसेविक(Goran Ivanisevic) को भी कॉंप्लेक्स हो जाए! काश, उसने पूरी पढ़ने की जहमत तो की होती! गोड नोस!

बच्चे की स्कूल फीस पिछले 3 महीनो से नही भरी। उसे स्कूल से नोटिस मिली है कि अगर मंडे तक फीस नही भरी तो उसे धूप मे खड़ा कर देंगे। मैंने बेटे को वॉइटमिन डी के फ़ायदे बताए। वो मुझे अजीब नज़रों से देखता रहा, "पापा, वाइ डॉन'ट यू वर्क लॉइक माय फ्रेंड्स डॅड्स दो!" अब उसे कैसे समझोऊं की मैं एक लेखक हूँ । एक राइटर, जो समाज बदल सकता है, जो अपनी लेखनी से इतिहास बना और बिगाड़ सकता है, जो... फर्गेट इट। वो नही समझेगा।

आज बीवी ने अलटिमेटम दिया। "सुनिए! रॉशन ख़तम हो गया। पिसौरीलाल ने उधार देने से माना कर दिया है। कहते हैं, पहले पुराना उधार चुकाओ। अगर कल तक रॉशन नही लाया, तो भूखे सोना पड़ेगा।  'कंप्लेंट्स, कंप्लेंट्स! ऑल शी डज़ इस कंप्लेन! अब समझ आता है की होमर ने शादी के बाद परॉडाइज़ लोस्ट और बीवी की मौत के बाद परॉडाइज़ रिगेन्ड क्यूँ लिखी!

पर मैं क्या करूँ? हिन्दी मे बी. ए. किया है। इस पढ़ाई से किसी बैंक मे मैनेज़री तो मिलेगी नही! तो, वही कर रहा हूँ, जिसकी पढ़ाई की है। ये दुनिया मुझे समझती ही नही! सम्टाइम्ज़,आई वंडर! वाइ दे से कि सिर्फ़ लूज़र्स कहते हैं की ये दुनिया उनको नही समझती! अब मुझे देखो! अ गुड राइटर। वॉट इफ़ मॉइ पब्लिशर्स डॉन'ट थिंक सो। दे ऑर ईडियट्स। साहिर लुधियानवी ने सही ही कहा है कि-- "एक दिन, दुनिया बदलकर, रास्ते पर आएगी। आज ठुकराती है, पर क्या? कल हमें अपनाएगी।"

नाउ, ही'स गेटिंग मिलियन्स आफ्टर हिज़ डेथ। आइ'म नोट गेटिंग मनी इनफ टू फीड मॉइ फॅमिली! अफ़सोस!

कल रात, बिल्डिंग के टेरेस पे दोस्तो के साथ दारू पी रहे थे। मेरे दोस्तो मे एक बंदा है-- उमेश। जब ऐसे ही बात निकली, इनकम कंपेरिज़न की, उसने कहा कि वो 70के पेर मंथ कमाता है, मेरे ख़याल से, मैं इतना हर साल कमाता हूँ। उसके बच्चे इंटरनेशनल स्कूल मे पढ़ते हैं,. हमेशा महंगी से महंगी मोबाइल ले आता है। उसके सामने मैं अपनी नोकिया 1110 नही निकलता। वाइ टू गिव हिम सेटिस्फेक्शन? ही हड द नर्व टू ऑफर मी अ जॉब इन हिज़ कंपनी! ब्लडी बर्क! ये कॅपिटलिस्ट्स कभी हम राइटर्स की फीलिंग्स नही समझेंगे!

आज सुबह से बड़ा परेशान हूँ।

छोटी बेटी को मलेरिया हो गया है। डॉक्टर कहते हैं की हॉस्पिटलॉइज करना पड़ेगा। मेरी जेब मे 35 रुपये हैं जिसमे से 30 रुपये सिगरेट के लिए इअरमार्क्ड हैं। कौन सा अस्पताल 5 रुपये मे भरती करता है? सोचा, बीवी से बोलूं कि मंगलसूत्र गिरवी रख देते हैं, फिर याद आया कि वो तो पिछले महीने ही बिक गया! मेरी शादी की अंगूठी भी इसी पेट की आग मे स्वाहा हो गयी। मैंने अपने सामने पड़े सफेद काग़ज़ को देखा। मुझे लगा, उसपर कुछ गिरा है। पानी की चार बूँदें। मेरी आँखें नम थी।

मैने अपना नोकिया 1110 उठाया और उमेश का नंबर लगाया। शायद उसका जॉब ऑफर अभी भी ओपन हो!  कभी -कभी, बड़े लोग भी छोटी हरक़त करते ही हैं, ना! मैं जानता हूँ साहिर ने सही कहा है -

"उभरेंगे एक बार, अभी दिल के वलवले,
माना के दब गये हैं, ग़म-ए-ज़िंदगी से हम"

- राकेश पांडे
ई-मेल: shashwatpande@gmail.com

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