इस विशाल प्रदेश के हर भाग में शिक्षित-अशिक्षित, नागरिक और ग्रामीण सभी हिंदी को समझते हैं। - राहुल सांकृत्यायन।

हिसाबे-इश्क़ है साहिब | ग़ज़ल (काव्य)

Print this

Author: अरविन्द कुमार सिंहानिया

हिसाबे-इश्क़ है साहिब ज़रा भी कम न निकलेगा,
कि कुछ आँसू बहाने से, ये दर्दो-ग़म न निकलेगा !

इन आँखों मे समन्दर है मिरि दर्द-ए-मुहब्बत का,
मग़र इनसे कोई मोती, कोई नीलम न निकलेगा !

अगर तुमने यह माना है, मैं छलिया हूँ, फ़रेबी हूँ,
मैं चाहे जो सफाई दूँ, तुम्हारा वहम न निकलेगा !

हमेशा चाँदनी हो रात, भला कैसे यह मुमकिन है?
अगर हैं बन्दिशें, तो चाँद भी, पैहम न निकलेगा !

तिरे दीदार को अटकी हैं सांसे जिस्म में शायद,
तुम्हे देखे बिना दिलबर हमारा दम न निकलेगा !

फ़रिश्तों तुम मिरि रूह की, अच्छे से तलाशी लो,
तुम्हे मुझपे कोई धेला, कोई दिरहम न निकलेगा !

वहम तूने भी तो ‘अरविन्द’ ज़हन में पाल रक्खा है,
कि तेरी शोख़ गज़लों का कभी मौसम न निकलेगा !!

-अरविन्द कुमार ‘सिंहानिया’
 ई-मेल : arvindkumarsinghania@gmail.com


शब्दार्थ :

हिसाबे-इश्क़ = इश्क़ का हिसाब,

दर्द-ए-मुहब्बत = मुहब्बत का दर्द

नीलम = एक क़ीमती रत्न

पैहम = लगातार/निरन्तर

रूह = आत्मा

दिरहम = एक करेंसी (रुपया-पैसा)

Back

 
Post Comment
 
 
 
 
 

सब्स्क्रिप्शन

सर्वेक्षण

भारत-दर्शन का नया रूप-रंग आपको कैसा लगा?

अच्छा लगा
अच्छा नही लगा
पता नहीं
आप किस देश से हैं?

यहाँ क्लिक करके परिणाम देखें

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें

आपका नाम
ई-मेल
संदेश