हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

हिस्से का दूध | लघुकथा (कथा-कहानी)

Print this

Author: मधुदीप

उनींदी आँखों को मलती हुई वह अपने पति के करीब आकर बैठ गई। वह दीवार का सहारा लिए बीड़ी के कश ले रहा था।

‘‘सो गया मुन्ना....?’’

‘‘जी! लो दूध पी लो।’’ सिल्वर का पुराना गिलास उसने बढ़ाया।

‘‘नहीं, मुन्ने के लिए रख दो। उठेगा तो....।’’ वह गिलास को माप रहा था।

‘‘मैं उसे अपना दूध पिला दूँगी।’’ वह आश्वस्त थी।

‘‘पगली, बीड़ी के ऊपर दूध–चाय नहीं पीते। तू पी ले।’’ उसने बहाना बनाकर दूध को उसके और करीब कर दिया।

तभी.... बाहर से हवा के साथ एक स्वर उसके कानों से टकराया। उसकी आँखें कुर्ते की खाली जेब में घुस गई।

‘‘सुनो, जरा चाय रख देना।’’

पत्नी से कहते हुए उसका गला बैठ गया।

-मधुदीप
[1 मई 1950 - 11 जनवरी 2022]

Back

 
Post Comment
 
 
 
 
 

भारत-दर्शन रोजाना

Bharat-Darshan Rozana

सब्स्क्रिप्शन

इस अंक में

 

इस अंक की समग्र सामग्री पढ़ें

 

 

सम्पर्क करें