विदेशी भाषा के शब्द, उसके भाव तथा दृष्टांत हमारे हृदय पर वह प्रभाव नहीं डाल सकते जो मातृभाषा के चिरपरिचित तथा हृदयग्राही वाक्य। - मन्नन द्विवेदी।

वो बचा रहा है गिरा के जो (काव्य)

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Author: निज़ाम-फतेहपुरी

वो बचा रहा है गिरा के जो, वो अज़ीज़ है या रक़ीब है
न समझ सका उसे आज तक, कि वो कौन है जो अजीब है

मेरी ज़िंदगी का जो हाल है, वो कमाल मेरा अमाल है
जो किया उसी का सिला है सब, मैंने ख़ुद लिखा ये नसीब है

जिसे ढूँढता रहा उम्र भर, रहा साथ-साथ दिखा न पर
मेरा साथ उसका अजीब है, न वो दूर है न क़रीब है

जहाँ दिल में प्यार भरा हुआ, वहीं जन्म शायरी का हुआ
जो क़लम से आग उगल रहा, वो नजीब है न अदीब है

भरी नफ़रतें जहाँ दिल में हों, वहाँ दिल सुकूँ कहाँ पाएगा
जो फ़िज़ा में ज़हर मिला रहा, वो मुहिब नही है मुहीब है

वो डरे ज़माने के ख़ौफ़ से, जिसे मौत पर है यक़ीं नहीं
मैं डरूँ किसी से जहाँ में क्यूँ, मेरे साथ मेरा हबीब है

यहाँ आया जो उसे जाना है, यही ला-फ़ना वो निज़ाम है
है करम ख़ुदा का उसी पे सब, जो अमीर है न ग़रीब है

-निज़ाम-फतेहपुरी
 ग्राम व पोस्ट मदोकीपुर
 ज़िला- फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत
 ईमेल :  babukhan3716@gmail.com
 6394332921
 9198120525

 

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