हिंदी चिरकाल से ऐसी भाषा रही है जिसने मात्र विदेशी होने के कारण किसी शब्द का बहिष्कार नहीं किया। - राजेंद्रप्रसाद।

खम्भे पर बेल (कथा-कहानी)

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Author: सुनील कुमार शर्मा

मोलू चायवाले की दुकान के सामने, गंदे नाले के किनारे खड़े बिजली के खम्भे पर गलती से एक जंगली बेल चढ़ गयी। हर रोज मोलू की दुकान पर बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ गपशप करने वाले देश के जागरूक नागरिकों की निगाह, जब उस बेल पर पड़ी तो वे सतर्क हो गए। उन्होंने तुरंत इसकी सूचना मोहल्ले के पार्षद को दी। पार्षद महोदय गरजे, "मेरे इलाके में इस बेल ने खम्भे पर चढ़ने की जुर्रत कैसे की?... चलो हम विद्युत् विभाग के एस.डी.ओ के पास चलते है।"

एस.डी.ओ साहब ने पूछा, "किसी को कोई करंट-वरंट तो नहीं लगा? मोहल्ले की लाइट तो नहीं गुल हुई?"

"अभी तो ऐसा कुछ नहीं हुआ।" सभी लोग एक साथ बोले।

"... फिर आप यहाँ क्या लेने आये हैं? कुछ होगा तो हम जरूर एक्शन लेंगे।" एस.डी.ओ साहब लापरवाही से बोले।

जिसे सुनकर पार्षद महोदय ने लाल-पीले होकर लोगों से कहा,"... आप जानते ही है कि इस समय हमारे विपक्षी दल की सरकार सत्ता में है। यह सरकार हमारे क्षेत्र का कोई भला नहीं चाहती... अब हम अपनी पार्टी के विधायक जयगोपाल चौधरी के पास चलते है।

उनकी बात सुनकर, विधायक जयगोपाल चौधरी उछल पड़े, "इस मुद्दे पर जब मैं विधानसभा में बोलूँगा तो भूकंप आ जायेगा।"

"भूकंप आने से कहीं वो खम्भा तो नहीं गिर जायेगा?" किसी ने आशंका व्यक्त की।  यह सुनकर, विधायक ने आँखें निकालकर चेतावनी दी, "... खम्भा बेशक़ गिर जाये; पर उस पर लिपटी हुई बेल किसी सूरत में नहीं गिरनी चाहिए।"

विधानसभा में बिजली मंत्री बोले, "अध्यक्ष महोदय! हमारे प्रदेश में साठ लाख दस हज़ार दो सौ खम्भे हैं। हम सभी खम्भों को चैक करवा रहे हैं। यहाँ पर जयगोपाल चौधरी जी ने जिस खम्भे का जिक्र किया है, उसका नंबर आठ लाख सात हज़ार पाँच सौ तीन है... जब इस खम्भे का नंबर आएगा; तो इसके साथ जो समस्या है, दूर कर दी जाएगी... अध्यक्ष महोदय! सरकार चाहती है कि किसी के साथ भेदभाव न हो; इसलिए सरकार ने सभी खम्भों को चैक करवाने का फैसला लिया है।"

बिजली मंत्री की इस दलील से संतुष्ट न होकर विरोध स्वरूप, समस्त विपक्ष विधानसभा से 'वॉकआउट' कर गया। फिर समस्त विपक्ष ने अगले ही दिन उसी बिजली के खम्भे के पास धरने पर बैठने का फैसला किया।

अगले दिन मोलू की दुकान के पास शामियाने गढ़ गए। प्रदेश के बड़े-बड़े कामरेड, ट्रेड यूनियनों के प्रधान, बिरादरियों के प्रधानों के अलावा धार्मिक संगठनों के लोग भी धरने पर बैठ गए। टी.वी चैनलों पर धरने का सीधा प्रसारण शुरू हो गया।

एक नेता जी दहाड़ रहे थे, " डीजल-पेट्रोल की कीमतों से भी तेजी से बढ़ते हुए यह बेल बिजली की तारों के बिल्कुल करीब पहुँच गयी है... और यह निकम्मी सरकार सो रही है। यानी कि यह सरकार लोगों के जीवन से खिलवाड़ कर रही है ...।"

तभी एक सिरफिरा आदमी किसी भंडारे का आयोजन समझकर वहाँ पहुँच गया। उसे देखकर मोलू चायवाला बोला, "यह बेचारा बहुत ज्यादा पढ़-लिखकर पागल हो गया हैं;  कभी-कभी बड़े काम की बातें करता हैं। उस सिरफिरे आदमी ने मोलू से पूछा, "यहाँ क्या हो रहा है?"

"सामने वाले खम्भे पर चढ़ी बेल को हटवाने के लिए यह सब हो रहा हैं।" सिरफिरे को यह समझाकर मोलू अपने काम में लग गया,  क्योंकि उस समय उसे जरा भी फुरसत ना थी। उस एक ही दिन में उसके इतने ब्रैड-पकौड़े बिक गए थे, जितने एक साल में भी न बिकते थे। वह सिरफिरा आदमी कुछ देर तक उस बेल की तरफ देखता रहा। फिर वह कुछ इरादा करके, मोलू की अंगीठी के पास पहुँच गया। फिर उसने चुपके से, वहाँ पड़ी हुई छोटी-सी कुल्हाड़ी उठा ली। सभी इतने व्यस्त थे कि उसकी इस हरकत पर किसी ने ध्यान नहीं दिया। उस कुल्हाड़ी को बगल में दबाए हुए वह चुपचाप उस खम्भे के पास पहुँच गया। कोई कुछ समझ पाता उससे पहले ही उसने कुल्हाड़ी के एक ही वार से उस बेल को जड़ से काट दिया। फिर उसने कुल्हाड़ी में फँसाकर उसे एक झटके से नीचे गिरा दिया। उसके बाद वह, "हा! हा!! हा...!!!" करके जोर-जोर से हँसने लगा।

उस बेल को कटता देखकर, सभी लोग उसकी तरफ दौड़ पड़े। जब उसने आगे से कुल्हाड़ी लहराई तो भीड़ में से आवाज़ आयी, "रुक जाओ.. यह पागल है, कही मार न दे।" यह सुनकर सभी रुक गए।

एक नेता जी चिल्लाए, "ओ पागल! तूने यह क्या कर दिया? यह तो सरकार का काम था। विभाग का काम था।"

"ओ सयाने लोगों! क्या सभी काम सरकारों के होते हैं?  विभागों के होते हैं?  क्या हमारी कोई ड्यूटी नहीं होती?" सिरफिरा कुल्हाड़ी को लहराते हुए, बड़े आक्रोश के साथ बोले चला जा रहा था।

   -सुनील कुमार शर्मा
    ईमेल : sharmasunilkumar727@gmail.com

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