अब की बार अरे ओ फागुन
मन का आँगन रन-रंग जाना।
युगों -युगों से भीगी नहीं बसंती चोली
रही सदा -सदा ही सूनी -सूनी मेरी होली
पुलकन -सिहरन अंग-अंग भर जाना।
अजब हवा है, मन मौसम बहक उठे हैं
दावानल -सम अधर पलाशी दहक उठे हैं
बरसा कर रति-रंग, दंग कर जाना।
बरसों बाद प्रवासी प्रियतम घर आएंगे
मेरे विरही नयन लजाते शरमायेंगे
तू पलकों में मिलन भंग भर जाना ।
अब की बार अरे ओ फागुन
मन का आँगन रन-रंग जाना ।
- कृष्णा कुमारी
ई-मेल: krishna.kumari.kamsin9@gmail.com
देहात का विरला ही कोई मुसलमान प्रचलित उर्दू भाषा के दस प्रतिशत शब्दों को समझ पाता है। - साँवलिया बिहारीलाल वर्मा।
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