राजा के दो हाथ थे। एक का नाम था 'दायाँ' और दूसरे का 'बायाँ'। राजा को जब कोई काम न होता, तो ये दोनों बैठे-ठाले आपस में उँगलियाँ लड़ाया करते थे। एक-दूसरे की पीठ खुजाते। हथेलियाँ मलते। कभी एक-दूसरे के नाखून काटते।

दोनों को एक बुरी आदत थी। राजा जब कोई बात करता तो वे उसकी बातों की नकल करने लगते। राजा कहता चाँद गोल है तो दायाँ एक उँगली खोलकर दायरा बना देता। कभी-कभी इसमें बायाँ भी शामिल हो जाता और दोनों मिलकर एक गोल फुटबॉल की शक्ल बना देते। बायाँ ज़रा कम बोलता था, लेकिन दायाँ तो ढीठ था। उससे रहा ही नहीं जाता था। राजा की हर बात पे हरकत में आ जाता था। राजा छींकने लगता तो दायाँ ख्वामख्वाह नाक मसल-मसल के उसे रोकने की कोशिश करता। ...पर छींक तो आनी ही थी।

राजा जब खाना खाने बैठता तो वही निवाले तोड़-तोड़ के मुँह में डालता था। उसे हिचकी आती तो फ़ौरन पानी का गिलास उठाकर उसके मुँह पे लगा देता। 

सेवा में इतने चुस्त दोनों कि राजा कभी सूरज की तरफ़ देखता तो उसके कहने से पहले दायाँ लपक के आँख पे साया कर देता।

कभी-कभी जल्दी भी कर बैठते थे, दाएँ ने जल्दी की सेवा में राजा को मालूम था कि दूध का गिलास गरम है लेकिन दाएँ ने होशियारी की, और अपनी दो उँगलियाँ जला लीं। दूध राजा के कपड़ों पर गिरा दिया। राजा ने ज़्यादा कुछ नहीं कहा, "आ तेरी... कम्बख्त!" बस इतना कह के चुप हो गए। बाएँ ने बढ़ के राजा के कपड़े झाड़ दिए, बस! राजा ने भी हमदर्दी जताई और डॉक्टर को बुला के मरहम लगवा दी।

दोनों सेवादार भी थे। वफ़ादार भी थे। राजा की लड़ाई हो जाती किसी दुश्मन से, तो दायाँ फ़ौरन तलवार खींच लेता और बायाँ ढाल सँभाल लेता। राजा घोड़े पर सवार होता तो दायाँ चाबुक सँभाल लेता और बायाँ घोड़े की लगाम खींच के रखता था।

कभी राजा अपने ही खयालों में गुम होता तो वो मुँह लगे बारी-बारी उठते और राजा की मूँछें मरोड़ देते। कभी दाढ़ी में उँगलियाँ फेरने लगते! राजा बैठने का इरादा करता तो दायाँ झुककर कुर्सी उठा लेता। या राजा के "कुर्सी बाग में लगा दो” कहते ही दायाँ उँगली के इशारे से नौकर को बुला लेता।

वफ़ादार ऐसे कि राजा जो भी सोचता, बायाँ कागज़ निकालकर सामने करता और दायाँ फौरन दर्ज कर देता। कभी-कभी राजा थक जाता था उन दोनों से। इसलिए सोते वक्त दाएँ को तो सर के नीचे दबा लेता और बाएँ को खुला छोड़ देता। उसने दाया बाया देखा था कि दोनों एक-दूसरे के बेलगाम गवाह थे। एक हिलता तो दूसरा हिलता ज़रूर था।

नहलाते-धुलाते वही दोनों थे। राजा के कुछ कहने से पहले ही दायाँ साबुन उठा लेता और बाएँ से कहता, "बाएँ! मल, ज़ोर से मल!" राजा की बगलों में साबुन लगाने के लिए एक-दूसरे से छीन भी लेते थे। शरारती भी थे। कभी-कभी बायाँ राजा की आँख पे साबुन लगा देता तो राजा चिल्लाने लगता। दायाँ जल्दी-जल्दी पानी का लोटा उठा के राजा की आँखों पर उड़ेल देता और आँखें मल के साबुन का झाग बहा देता। लेकिन कभी-कभी राजा झरने के नीचे खड़ा हो जाता तो राजा को बहुत मज़ा आता, लेकिन ये दोनों छटपटाने लगते।

एक बार राजा के वज़ीर ने बगावत कर दी। और जब बगावत की तो राजा के ख्वाबगाह में घुस के सबसे पहले इन्हीं दोनों को हथकड़ियाँ पहनाईं। राजा की बेबसी देखकर दोनों को बहुत गुस्सा आया। उँगलियाँ भींचकर मुट्ठियाँ दिखाईं। लेकिन करते क्या? मजबूर थे बेचारे। न अपनी कुछ मदद कर सकते थे, न राजा की। वज़ीर ने राजा को ले जाकर किले की मीनार में बंद कर दिया। और दीवार के खूँटे से एक ज़ंजीर राजा के पाँवों में डाल दी। मीनार की ऊपर वाली कोठरी में कोई खिड़की, रोशनदान भी नहीं था। सिर्फ़ एक सलाखों वाला दरवाज़ा था जहाँ से पहरेदार आकर खाने की थाली रखता और लौट जाता। दोनों चाहते थे किसी तरह निवाला तोड़कर राजा के मुँह में डालें। लेकिन राजा बहुत गुस्से में था। दायाँ, बायाँ अपनी उँगली भींच के रह जाते। राजा की मजबूरी पर दोनों को बड़ी तकलीफ़ होती। 

एक रोज़ दोनों ने मिलकर दरवाज़े के कोने वाली सलाख पकड़ी और राजा से कहा कि तुम भी ज़ोर लगाओ। और टेढ़ी करके दो सलाख बाहर निकाल ली। उस रोज़ जब पहरेदार दाखिल हुआ तो बाएँ ने झटके से उसकी पगड़ी पैर की ओर गिरा दी और दाएँ ने सलाख उसके सर पे दे मारी। जैसे ही पहरेदार ने चीखने के लिए मुहँ खोला, बाएँ ने उसका मुँह बंद किया और दाएँ ने जल्दी से उसकी पगड़ी उसी के मुँह में ठूंस के औंधा कर दिया। दोनों ने मिल के उसी की पगड़ी से उसे गठरी की तरह बाँध दिया। दोनों ने कंधे-कुहनी तक का ज़ोर लगा के राजा के पैर की ज़ंजीर खोल दी। राजा के लिए मौका था। वह दरवाज़े से बाहर निकला और ऊपर की छत पर चढ़ के किले के पीछे वाली नदी में कूद गया। दाएँ-बाएँ ने भी खूब हाथ चलाए और राजा को लेकर दूसरे किनारे पर पहुँच गए।

फिर क्या था! पास ही घास चरता एक घोड़ा दिखा। दोनों ने उसकी गर्दन पे हाथ फेरा, फुसलाया और राजा को उसकी पीठ पर लेकर, गाँव पार करके सल्तनत की हद से बाहर निकल गए।

राजा का रसूख पड़ोसी राजाओं के साथ अच्छा था। महीने भर में राजा पड़ोसी की फौजें लेकर लौटा और गद्दार वज़ीर को निकाल बाहर किया।

फ़तह के बाद जब राजा रथ पे सवार शहर से गुज़रा तो फ़तेह का झंडा उसने दाएँ-बाँए के हाथ में थमा दिया था। दोनों बारी-बारी उसको लहरा-लहरा कर लोगों की जय-जयकार का जवाब दे रहे थे तो राजा मुस्कुरा-मुस्कुराकर यही काम कर रहे थे। 

-गुलज़ार