क्यों-क्यों लड़की | कहानी

रचनाकार: महाश्वेता देवी 

छोटी-सी लड़की थी वह, करीब दस साल की। एक बड़े-से साँप का पीछा कर रही थी। मैं उसके पीछे भागी, "ना मोइना, ना।"

"क्यों"? उसने पूछा।

"वो कोई धामन-वामन नहीं है, नाग है, नाग" !

"तो नाग को क्यों न पकहूँ"?

"अरे काट लेगा" !

मैं उसे ऑफ़िस तक लाई। वहाँ उसकी माँ खीरी एक टोकरी बुन रही थी।

"चलो थोड़ा आराम कर लो" मैंने कहा।

"क्यों?”

"क्यों? थकी नहीं हो क्या"?

मोइना ने सिर हिलाया, "बाबू की बकरियाँ कौन घर लाएगा? और लकड़ी लाना, पानी लाना, ये सब कौन करेगा?"

खीरी ने कहा, "बाबू "बाबू ने ने जो चावल भेजा है, उसके लिए उसे धन्यवाद देना न भूलना।"

"क्यों? क्यों दूँ धन्यवाद उसे? उसकी गोशाला धोती हूँ, हज़ारों काम करती हूँ उसके लिए कभी धन्यवाद देता है मुझे? मैं क्यों उसे धन्यवाद दूँ?"

मोइना अपने काम पर भाग गई। खीरी सिर हिलाती रह गई। ऐसी बच्ची नहीं देखी कभी। बस कहती रहती है 'क्यों? क्यों? गाँव के पोस्टमास्टर ने तो उसे 'क्यों-क्यों लड़की' का नाम दे रखा है।

"मुझे तो अच्छी लगती है मोइना।"

"इतनी ज़िद्दी है कि एक बात पकड़ ले तो उससे हटती नहीं।"

मोइना आदिवासी लड़की थी, शबर जाति की। शबर लोग गरीब और भूमिहीन थे। बाकी शबर लोग कभी शिकायत करते सुनाई नहीं देते थे, सिर्फ मोइना ही थी जो सवाल पर सवाल करती जाती।

"क्यों मुझे मीलों चलना पड़ता है नदी से पानी लाने के लिए? क्यों रहते हैं हम पत्तों की झोंपड़ी में? हम दिन में दो बार चावल क्यों नहीं खा सकते" ?

मोइना गाँव के बाबुओं की बकरियाँ चराने का काम करती, पर न तो वह अपने आप को दीन-हीन समझती, न ही मालिकों का अहसान मानती। वह अपना काम करती, घर आ जाती और बुदबुदाती रहती, "क्यों उनका बचा-खुचा, खाऊँ मैं? मैं तो बढ़िया खाना बनाऊँगी शाम को। हरे पत्ते और चावल और मिर्ची वाली और सारे घर वालों के साथ बैठ कर खाऊँगी।"

वैसे शबर लोग आमतौर पर अपनी लड़कियों को काम करने नहीं भेजते हैं, पर मोइना की माँ एक पैर से लँगड़ाती थी वह ज़्यादा चल-फिर नहीं सकती थी। उसके पिता दूर जमशेदपुर काम की तलाश में गए हुए थे और उसका भाई गोरो जलाऊ लकड़ी लाने जंगल जाता था। सो, मोइना को भी काम पर जाना पड़ता था।

उस अक्तूबर में, मैं समिति के साथ वहाँ पूरा एक माह रुकी। एक सुबह मोइना ने घोषणा की कि वह समिति वाली झोंपड़ी में मेरे साथ रहेगी।

"बिल्कुल नहीं", खीरी ने कहा।

"क्यों नहीं, इतनी बड़ी झोंपड़ी है एक बुढ़िया को कितनी जगह चाहिए" ?

"तुम्हारे काम का क्या होगा?"

"काम के बाद आया करूँगी।"

और वह एक जोड़ी कपड़े और एक नेवले का बच्चा लिये आ पहुँची।

"ये बस जरा-सा खाता है और बुरे साँपों को दूर भगा आता है," उसने कहा, "अच्छे वाले साँपों को मैं पकड़ कर माँ को दे देती हूँ"

हमारी समिति की शिक्षिका मालती बोनाल ने मुझसे कहा, "आप तो तंग आ जाएँगी इसकी 'क्यों-क्यों' सुनते हुए" और वाकई, वह अक्तूबर ऐसा बीता कि पूछो मत ! "क्यों मुझे बाबू की बकरियाँ चरानी पड़ती हैं? उसके लड़के खुद ही कर सकते हैं।

मछलियाँ बोल क्यों नहीं पातीं? अगर कई सारे तारे सूरज से भी बड़े हैं तो वे इतने छोटे क्यों नज़र आते हैं? हर रात को तुम सोने से पहले किताबें क्यों पढ़ती हो"?

"क्योंकि किताबों में तुम्हारी 'क्यों-क्यों' के जवाब मिलते हैं।"

इस बार मोइना चुप रही, उसने कमरा ठीक-ठाक किया। फूलों वाले झाड़ को पानी दिया और नेवले को मछली दी फिर उसने कहा, "मैं पढ़ना सीखूँगी और अपने सारे सवालों के जवाब ढूंढ़ निकालूंगी।"

जो-जो वह मुझसे सीखती, वह बकरियाँ चराते समय दूसरे बच्चों को बताती "कई तारे तो सूरज से भी बड़े हैं सूरज पास है इसलिए बड़ा दिखता है। मछलियाँ हमारी तरह बातें नहीं करतीं। मछलियों की अपनी भाषा है, जो सुनाई नहीं देती। तुम्हें पता है, पृथ्वी गोल है।"

एक साल बाद जब मैं उस गाँव में दुबारा पहुँची तो सबसे पहले सुनाई दी मोइना की आवाज़ा "स्कूल क्यों बंद है?"- समिति के स्कूल के अंदर एक मिमियाती बकरी को अपने साथ घसीटते हुए उसने मालती को ललकारा।

"क्या मतलब है तुम्हारा, क्यों बंद है?"

“मैं भी क्यों न पढूँ।"

"तो तुम्हें रोक कौन रहा है?"

"पर कोई कक्षा ही नहीं लगी।"

"स्कूल पूरा हो चुका था।"

"क्यों?"

"तुम जानती हो मोइना, मैं सुबह नौ से ग्यारह बजे तक कक्षा लगाती हूँ।"

मोइना ने पाँव पटक कर कहा, "तुम समय बदल क्यों नहीं सकतीं? मुझे बाबू की बकरियाँ चरानी होती हैं, सुबह, मैं तो सिर्फ़ ग्यारह बजे के बाद ही आ सकती हूँ, तुम पढ़ाओगी नहीं तो मैं सीखूँगी कहाँ से? मैं बूढ़ी माँ को बता दूँगी कि बकरी चराने वाले या गाय चराने वाले, हम में से कोई भी नहीं आ सकेगा, अगर स्कूल का समय नहीं बदला तो।“

तभी उसने मुझे देखा और अपनी बकरी ले भाग खड़ी हुई।

शाम को मैं मोइना की झोंपड़ी पर गई। चौके की अंगार के पास मज़े-से बैठी मोइना अपनी छोटी बहिन और बड़े भाई को बता रही थी, "एक पेड़ काटो तो दो पेड़ लगाओ। खाने के पहले हाथ धो लो, जानते हो क्यों? पेट दर्द हो जाएगा अगर नहीं धोओगे। तो तुम कुछ नहीं जानते हो, क्यों? क्योंकि तुम समिति की कक्षा में नहीं जाते।"

तुम्हें क्या लगता है, गाँव में जब प्राइमरी स्कूल खुला तो उसमें दाखिल होने वाली पहली लड़की कौन थी?- मोइना

मोइना अब अठ्ठारह साल की है। वह समिति के स्कूल में पढ़ाती है। अगर तुम उसके स्कूल के पास से गुज़रोगे तो निश्चित ही तुम्हें उसकी बेचैन आवाज़ सुनाई देगी।

"आलस मत करो। सवाल करो मुझसे। पूछो, क्यों मच्छरों को खत्म कराना चाहिए, क्यों ध्रुवतारा हमेशा उत्तरी आकाश में ही रहता है"?

और दूसरे बच्चे भी अब सीख रहे हैं पूछना "क्यों?"

वैसे मोइना को पता नहीं है कि मैं उसकी कहानी लिख रही हूँ। अगर उसे बताया जाए तो कहेगी, "क्यों? मेरे बारे में क्यों?"

– महाश्वेता देवी