
एक बार शेख चिल्ली काम की तलाश में शहर के बाजार में घूम रहे थे। तभी उन्हें एक सेठ मिला जिसके पास अंडों से भरी एक बड़ी टोकरी थी। सेठ को अपने घर तक वह टोकरी पहुँचवानी थी।
सेठ ने शेख चिल्ली से कहा, "भाई, क्या तुम यह टोकरी मेरे घर तक पहुँचा दोगे? बदले में मैं तुम्हें दो आने दूँगा।"
शेख चिल्ली खुशी-खुशी तैयार हो गए। उन्होंने टोकरी अपने सिर पर रखी और सेठ के पीछे-पीछे चल दिए। रास्ते में चलते-चलते शेख चिल्ली के दिमाग में ख़याली पुलाव पकने लगे।
उन्होंने सोचा--"इन दो आनों से मैं मुर्गी के कुछ अंडे खरीदूँगा। उन अंडों से चूजे निकलेंगे। फिर मेरे पास बहुत सारी मुर्गियाँ हो जाएँगी। वे मुर्गियाँ और भी अंडे देंगी और जल्द ही मेरे पास एक बड़ा पोल्ट्री फार्म होगा।"
शेख चिल्ली अपनी ही धुन में मुस्कुराने लगे और आगे सोचने लगे--"मुर्गियाँ बेचकर मैं दो गायें खरीदूँगा। फिर उन गायों के बछड़े होंगे। धीरे-धीरे मेरे पास गायों का बड़ा तबेला होगा। मैं दूध और घी बेचकर बहुत अमीर बन जाऊँगा। फिर मैं एक आलीशान महल बनवाऊँगा और एक सुंदर राजकुमारी से शादी करूँगा।"
बात यहीं नहीं रुकी। उन्होंने कल्पना की--"मेरे सुंदर-सुंदर बच्चे होंगे। वे मेरे पास आएंगे और कहेंगे— 'अब्बा जान, हमें खिलौने चाहिए।' तब मैं कहूँगा— 'अभी नहीं, बाद में दूँगा।' और जब वे ज़िद करेंगे, तो मैं गुस्से में अपना सिर ऐसे हिलाऊँगा..."
जैसे ही शेख चिल्ली ने हकीकत में गुस्से का नाटक करते हुए ज़ोर से अपना सिर हिलाया, उनके सिर पर रखी अंडों की टोकरी नीचे गिर गई!
सारे अंडे सड़क पर फूट गए। सेठ चिल्लाया, "मूर्ख! तुमने मेरे सारे अंडे फोड़ दिए! अब मुझे इनका हर्जाना कौन देगा?"
शेख चिल्ली रोते हुए बोले, "सेठ जी, आप तो सिर्फ अपने अंडों के लिए रो रहे हैं, यहाँ तो मेरा पूरा महल गिर गया, मेरी बीवी-बच्चे चले गए और मेरा पूरा कारोबार तबाह हो गया!"
बेचारा सेठ अपना सिर पकड़कर बैठ गया, उसे समझ आ गया कि उसने गलत आदमी को काम पर रखा था।
सीख: हवा में महल बनाने से हकीकत की ज़मीन हाथ से निकल जाती है।
[भारत-दर्शन संकलन]