कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 6
झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं | ग़ज़ल
झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं
मेरे तश्नालब पर पहरे उसके हैं
हमने दिन भी अँधियारे में काट लिये
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मेरे तश्नालब पर पहरे उसके हैं
हमने दिन भी अँधियारे में काट लिये
ताज़े-ताज़े ख़्वाब | ग़ज़ल
ताज़े-ताज़े ख़्वाब सजाये रखता है
यानी इक उम्मीद जगाये रखता है
उसको छूने में अँगुलि जल जाती हैं
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यानी इक उम्मीद जगाये रखता है
उसको छूने में अँगुलि जल जाती हैं
मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल
मैं अपनी ज़िन्दगी से रूबरू यूँ पेश आता हूँ
ग़मों से गुफ़्तगू करता हूँ लेकिन मुस्कुराता हूँ
ग़ज़ल कहने की कोशिश में कभी ऐसा भी होता है
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ग़मों से गुफ़्तगू करता हूँ लेकिन मुस्कुराता हूँ
ग़ज़ल कहने की कोशिश में कभी ऐसा भी होता है
भरोसा इस क़दर मैंने | ग़ज़ल
भरोसा इस क़दर मैंने तुम्हारे प्यार पर रक्खा
शरारों पर चला बेख़ौफ़, सर तलवार पर रक्खा
यक़ीनन मैं तुम्हारे घर की पुख़्ता नींव हो जाता
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शरारों पर चला बेख़ौफ़, सर तलवार पर रक्खा
यक़ीनन मैं तुम्हारे घर की पुख़्ता नींव हो जाता
पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल
पुराने ख़्वाब के फिर से नये साँचे बदलती है
सियासत रोज़ अपने खेल में पाले बदलती है
हम ऐसे मोड़ पर आ कर अचानक टूट जाते हैं
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सियासत रोज़ अपने खेल में पाले बदलती है
हम ऐसे मोड़ पर आ कर अचानक टूट जाते हैं