भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 6

कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar

झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं | ग़ज़ल

झील, समुंदर, दरिया, झरने उसके हैं
मेरे तश्नालब पर पहरे उसके हैं
हमने दिन भी अँधियारे में काट लिये
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ताज़े-ताज़े ख़्वाब | ग़ज़ल

ताज़े-ताज़े ख़्वाब सजाये रखता है
यानी इक उम्मीद जगाये रखता है
उसको छूने में अँगुलि जल जाती हैं
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मैं अपनी ज़िन्दगी से | ग़ज़ल

मैं अपनी ज़िन्दगी से रूबरू यूँ पेश आता हूँ
ग़मों से गुफ़्तगू करता हूँ लेकिन मुस्कुराता हूँ
ग़ज़ल कहने की कोशिश में कभी ऐसा भी होता है
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भरोसा इस क़दर मैंने | ग़ज़ल

भरोसा इस क़दर मैंने तुम्हारे प्यार पर रक्खा
शरारों पर चला बेख़ौफ़, सर तलवार पर रक्खा
यक़ीनन मैं तुम्हारे घर की पुख़्ता नींव हो जाता
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पुराने ख़्वाब के फिर से | ग़ज़ल

पुराने ख़्वाब के फिर से नये साँचे बदलती है
सियासत रोज़ अपने खेल में पाले बदलती है
हम ऐसे मोड़ पर आ कर अचानक टूट जाते हैं
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कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें

कृष्ण सुकुमार की ग़ज़लें
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कृष्ण सुकुमार | Krishna Sukumar का जीवन परिचय (Biography)

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