देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

डॉ सुधेश साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 6

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मैंने लिखा कुछ भी नहीं | ग़ज़ल

मैंने लिखा कुछ भी नहीं
तुम ने पढ़ा कुछ भी नहीं ।
जो भी लिखा दिल से लिखा
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सामने गुलशन नज़र आया | ग़ज़ल

सामने गुलशन नज़र आया
गीत भँवरे ने मधुर गाया ।
फूल के संग मिले काँटे भी
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डॉ॰ सुधेश के मुक्तक

प्राण का पंछी सवेरे क्यों चहकता है
शबनम बूँद से नया बिरवा लहकता है
हड्डियों के पसीने से इसे सींचा है
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पीर

हड्डियों में बस गई है पीर।
पाँव में काँटा लगा जैसे
जो बढ़ते क़दम को रोके
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डॉ सुधेश के दोहे

हिन्दी हिन्दी कर रहे 'या-या' करते यार। 
अंगरेजी में बोलते जहां विदेशी चार॥
मुख पोथी ही नहीं है दर्पण है साकार।
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डॉ सुधेश की ग़ज़लें

डॉ सुधेश दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय से हिन्दी के प्रोफ़ेसर पद से सेवानिवृत्त हैं। आप हिंदी में विभिन्न विधाओ में सृजन करते हैं। यहाँ आपकी ?...
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डॉ सुधेश का जीवन परिचय (Biography)

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