डॉ शम्भुनाथ तिवारी साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 11
लोग क्या से क्या न जाने हो गए | ग़ज़ल
लोग क्या से क्या न जाने हो गए
आजकल अपने बेगाने हो गए
बेसबब ही रहगुज़र में छोड़ना
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आजकल अपने बेगाने हो गए
बेसबब ही रहगुज़र में छोड़ना
बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या | ग़ज़ल
बिला वजह आँखों के कोर भिगोना क्या
अपनी नाकामी का रोना रोना क्या
बेहतर है कि समझें नब्ज़ ज़माने की
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अपनी नाकामी का रोना रोना क्या
बेहतर है कि समझें नब्ज़ ज़माने की
नहीं कुछ भी बताना चाहता है | ग़ज़ल
नहीं कुछ भी बताना चाहता है
भला वह क्या छुपाना चाहता है
तिज़ारत की है जिसने आँसुओं की
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भला वह क्या छुपाना चाहता है
तिज़ारत की है जिसने आँसुओं की
परिंदे की बेज़ुबानी
बड़ी ग़मनाक दिल छूती परिंदे की कहानी है!
कड़कती धूप हो या तेज़ बारिश का ज़माना हो,
क़हर तूफ़ान का हो या बिजलियों का फ़साना हो !
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कड़कती धूप हो या तेज़ बारिश का ज़माना हो,
क़हर तूफ़ान का हो या बिजलियों का फ़साना हो !
गर धरती पर इतना प्यारा
गर धरती पर इतना प्यारा,
बच्चों का संसार न होता !
बच्चे अगर नहीं होते तो,
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बच्चों का संसार न होता !
बच्चे अगर नहीं होते तो,
नहीं है आदमी की अब | हज़ल
नहीं है आदमी की अब कोई पहचान दिल्ली में
मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में
तलाशो मत मियाँ रिश्ते, बहुत बेदर्द हैं गलियाँ
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मिली है धूल में कितनों की ऊँची शान दिल्ली में
तलाशो मत मियाँ रिश्ते, बहुत बेदर्द हैं गलियाँ
हौसले मिटते नहीं
हौसले मिटते नहीं अरमाँ बिखर जाने के बाद
मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद
कौन समझेगा कभी उस तैरने वाले का ग़म
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मंजिलें मिलती है कब तूफां से डर जाने के बाद
कौन समझेगा कभी उस तैरने वाले का ग़म
कौन यहाँ खुशहाल बिरादर
कौन यहाँ खुशहाल बिरादर
बद-से-बदतर हाल बिरादर
क़दम-क़दम पर काँटे बिखरे
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बद-से-बदतर हाल बिरादर
क़दम-क़दम पर काँटे बिखरे
उलझे धागों को सुलझाना
उलझे धागों को सुलझाना मुश्किल है
नफरतवाली आग बुझाना मुश्किल है
जिनकी बुनियादें खुदग़र्ज़ी पर होंगी
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नफरतवाली आग बुझाना मुश्किल है
जिनकी बुनियादें खुदग़र्ज़ी पर होंगी
माँ की ममता जग से न्यारी !
माँ की ममता जग से न्यारी !
अगर कभी मैं रूठ गया तो,
माँ ने बहुत स्नेह से सींचा ।
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अगर कभी मैं रूठ गया तो,
माँ ने बहुत स्नेह से सींचा ।
माँ की याद बहुत आती है !
माँ की याद बहुत आती है !
जिसने मेरे सुख - दुख को ही ,
अपना सुख-दुख मान लिया था ।
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जिसने मेरे सुख - दुख को ही ,
अपना सुख-दुख मान लिया था ।