भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

बालकृष्ण शर्मा नवीन साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 3

बालकृष्ण शर्मा नवीन

जूठे पत्ते

क्या देखा है तुमने नर को, नर के आगे हाथ पसारे?
क्या देखे हैं तुमने उसकी, आँखों में खारे फ़व्वारे?
देखे हैं? फिर भी कहते हो कि तुम नहीं हो विप्लवकारी?
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गोई जीजी | कहानी

"अपने छोटे-से जीवन में मैं न-जाने कहाँ-कहाँ घूमा हूँ। न-जाने कितने सान्ध्य-प्रकाश में मैंने मानसिक परिस्थितियों का विश्लेषण किया है; किन्तु..." मेरे मित्र ग...
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विप्लव-गान | बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’

कवि, कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल-पुथल मच जाये,
एक हिलोर इधर से आये, एक हिलोर उधर से आये,
प्राणों के लाले पड़ जायें त्राहि-त्राहि स्वर नभ में छाये,
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बालकृष्ण शर्मा नवीन का जीवन परिचय (Biography)

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