आराधना झा श्रीवास्तव साहित्य Hindi Literature Collections
कुल रचनाएँ: 6
तलाश जारी है...
स्वदेस में बिहारी हूँ, परदेस में बाहरी हूँ
जाति, धर्म, परंपरा के बोझ तले दबी एक बेचारी हूँ।
रंग-रूप,नैन-नक्श, बोल-चाल, रहन-सहन
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जाति, धर्म, परंपरा के बोझ तले दबी एक बेचारी हूँ।
रंग-रूप,नैन-नक्श, बोल-चाल, रहन-सहन
माँ अमर होती है, माँ मरा नहीं करती
माँ अमर होती है,
माँ मरा नहीं करती।
माँ जीवित रखती है
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माँ मरा नहीं करती।
माँ जीवित रखती है
वो राम राम कहलाते हैं
अवधपुरी से जनकपुरी तक
प्रेम की गंगा बहाते हैं
वो राम राम कहलाते हैं।
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प्रेम की गंगा बहाते हैं
वो राम राम कहलाते हैं।