यह कैसे संभव हो सकता है कि अंग्रेजी भाषा समस्त भारत की मातृभाषा के समान हो जाये? - चंद्रशेखर मिश्र।

डॉ संध्या सिंह | सिंगापुर

डॉ संध्या सिंह का हिंदी शिक्षण में सिंगापुर में दो दशकों से भी अधिक का अनुभव है और वर्तमान में नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में हिंदी और तमिल भाषा विभागाध्यक्ष और वरिष्ठ हिंदी प्रवक्ता हैं। आपने हिंदी साहित्य में एम.ए. और बी.एड. की उपाधि के साथ ही पी.एच.डी. की है। आप सिंगापुर के ‘नान्यांग तेक्नोलौजिकल यूनिवर्सिटी सिंगापुर’ में हिंदी भाषा का पाठ्यक्रम बनाने, हिंदी भाषा-शिक्षण शुरू करवाने के साथ ही सिंगापुर के एन.पी.एस. इंटरनेशनल स्कूल में आधुनिक भाषाओं की विभागाध्यक्षा के रूप में पाठ्यक्रम बनाने का कार्य कर चुकी हैं।

विश्वविद्यालय की विभिन्न समितियों में भिन्न पदों का दायित्व निर्वहन करने के साथ ही सिंगापुर के कई मंत्रालयों व ‘पीपुल्स असोशियेशन सिंगापुर’ में हिंदी व भाषा सम्बन्धी कई कार्य इनके द्वारा किये जाते हैं। सिंगापुर में पंजीकृत पहली हिंदी पत्रिका ‘सिंगापुर संगम’ का सम्पादन करने के साथ ही ‘संगम सिंगापुर हिंदी संस्था की संस्थापक/अध्यक्ष हैं जो सिंगापुर में भिन्न आयोजनों और प्रतियोगिताओं द्वारा हिंदी के प्रसार में कार्यरत संस्था है। सिंगापुर के स्थानीय विद्यालयों में हिंदी शिक्षण से जुड़ी प्रमुख संस्था ‘हिंदी सोसाइटी सिंगापुर’ की उपसचिव हैं इस संस्था में ४५०० से भी अधिक छात्र हिंदी भाषा सीख रहे हैं। हिंदी साहित्य भारती संस्था की सिंगापुर प्रमुख भी हैं। केन्द्रीय हिंदी संस्थान से प्रकाशित पत्रिका प्रवासी साहित्य के मार्गदर्शक मंडल में भी शामिल हैं। राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान के डायस्पोरा सेंटर के मार्गदर्शन मंडल में शामिल हैं।

डॉ संध्या को सन 2018 में 11वें विश्व हिंदी सम्मलेन व 2022 में फीजी के हिंदी सम्मेलन में भारत सरकार द्वारा विशेष निमंत्रण मिला। 2019 में भोपाल में हुए ‘विश्व रंग’ साहित्यिक कार्यक्रम व 2020 में हंसराज कॉलेज द्वारा विश्व हिंदी दिवस सम्मेलन में भी आमंत्रित किया गया।

सिंगापुर, भारत, यूरोप, फीजी आदि कई जगहों पर शोध पत्र प्रस्तुत कर चुकी डॉ संध्या द्वारा विदेशियों के लिए भाषा शिक्षण से सम्बंधित रचित दोनों पुस्तकों को सिंगापुर के दोनों विश्वविद्यालयों में मुख्य पुस्तक के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। गद्य लेखन में विशेष रुचि रखने वाली डॉ संध्या को कई संस्थाओं द्वारा हिंदी गौरव सम्मान, हिंदी सेवी सम्मान, प्रवासी साहित्य सम्मान जैसे कई पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है।

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रूस के प्रो. लुदमिला खोखलोवा से बातचीत

 “हिंदी दोस्ती की भाषा है, इससे अलग किस्म के सपने पूरे होते हैं।”

प्रोफेसर लुदमिला खोखलोवा जी मास्को स्टेट यूनिवर्सिटी में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं। पिछले 45 सालों से रूस में हिंदी भाषा और साहित्य सिखा रही लुदमिला जी से जानते हैं उनकी जीवन यात्रा के बारे में, उनके शिक्षण के बारे में और हिंदी के बारे में उनके विचार।

आपका बहुत बहुत स्वागत है लुदमिला जी।

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एक लड़की

आज बार-बार जीवन बाईस साल पहले मुड़ उस दिन को याद कर रहा है जिसने एक लड़की के जीवन को एक अलग ही दिशा दे दी। नवरात्रि का समय और देवी दर्शन की चाह लिए एक लड़की विंध्यांचल से भोर में घर लौटती है । चूँकि भोर हो गई है इसलिए लौटते ही सुबह के कार्यक्रम में पुन: व्यस्त है और तभी कुछ ऐसा होता है जो उसके जीवन की सबसे ख़ास मोड़ बन जाती है। आखिर समय कैसे पंख लगाकर उड़ जाता है, पता भी नहीं चलता। धीरे-धीरे कब उस चुलबुली लड़की के प्रौढ़ा की ओर कदम बढ़ चले अहसास ही नहीं हुआ। आज अतीत में झाँकने पर कितनी बातें परत-दर-परत खुलती चली जाती हैं। एक सीधी-सादी 19 साल की लड़की जिसके लिए किसी बात में गहराई नहीं थी। हर बात मज़ाक में उड़ा देना जिसकी फितरत रही हो। पढ़ाई-लिखाई, घर की बातें सब उसके लिए गौण हो जाती थीं। कभी किसी चीज़ को गंभीरता से नहीं लिया हो। पारिवारिक माहौल ने उसमें एक अलग ही सोच विकसित कर दी थी। उसने तो सपने में एक ऐसे राजकुमार की कल्पना कर ली थी जो फ़िल्मों के किरदारों से प्रभावित हो। बाबुजी से मज़ाक में हमेशा कहती, “मेरी शादी तो ‘आई.ए.एस.’ से करवाइएगा ताकि ऐश की ज़िन्दगी जिऊँ। और हाँ, सबसे ज़रूरी अपने शहर में बिल्कुल नहीं। कहीं दूर अंडमान निकोबार में ढूँढिएगा ताकि रोज़-रोज़ रिश्तेदार आपको तंग करने न आएँ।” उसने अपने ‘करियर’, अपनी पहचान के बारे में तो कभी सोचा ही नहीं था। उसे तो ब्याह करके बस अपना घर बसाना था पर अचानक सपनों ने एक नया मोड़ ले लिया। वह ब्याह के बाद समुन्दर पार एक छोटे से टापू पर आ गई। सपने तो अब भी वही थे जो कॉलेज के दिनों में देखे थे, पर अब इन सपनों में विदेशी भूमि से जुड़ने का नया अध्याय जुड़ गया था। मज़ाक में कही हुई कुछ बातें सच हो गईं। कभी-कभी तो क्या रिश्तेदार तो शायद ही कभी उसके बाबुजी को तंग करने जाएँ।

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सिंगापुर में हिंदी का फ़लक | विश्व में हिंदी

विश्व आज वैश्विक गाँव बनता जा रहा है और इस वैश्विक गाँव में तमाम भाषाएँ अपने वजूद को बरक़रार रखने की कोशिश में लगी हैं। एक भाषा का हावी होना कई बार दूसरी भाषा के लिए ख़तरा उत्पन्न कर देता है और ऐसा कई परिस्थितियों में देखा गया है कि इस जद्दोजहद की लड़ाई में कभी-कभी कुछ भाषाएँ और संकुचित होती जाती हैं लेकिन कुछ लड़कर और निखरती है। हिंदी को लेकर भी कई अटकलें उसके राजभाषा बनने के पूर्व से आज तक लगाई जाती रही हैं और हिंदी के भारत की राष्ट्रभाषा न बनने के कारण कई बार प्रसार में अड़चनें भी आई हैं। पर वहीं यह भी सत्य है कि भारत की राष्ट्रीय भाषा का दर्जा भले ही हिंदी को न मिला हो लेकिन भारत से बाहर भारत की प्रतिनिधि भाषा के रूप में वह अवश्य अपने पंख पसार रही है। हिंदी भाषा के प्रति पिछले कुछ वर्षों में अधिक जागरूकता बढ़ी है। आज अगर कहें कि हिंदी वह रेलगाड़ी स्वरूप प्रतीत हो रही है जो वैश्विक पुल पर अपनी गति से आगे बढ़ रही है तो संभवत: अतिशयोक्ति नहीं होगी। दुनिया के मानचित्र में भारतीयों ने हर भाग में पहुँचने की कोशिश की है और अपने साथ भाषा और संस्कृति की मंजुषा भी ले जाने की कोशिश की है। जैसा कि माना जाता है कि भाषा ही चाहे व्यक्ति हो, समाज हो या राष्ट्र हो उसकी अस्मिता-पहचान की निकष है। हिंदी में इस दायित्व को निभाने और पूरा करने की सभी खूबियाँ मौजूद हैं जिनके बल पर आज वह भारत की भाषा के साथ ही कहीं न कहीं विश्व भाषा की ओर बढ़ रही है। लाख विरोधों के बाद भी हिंदी अपनी पहचान विश्व जनता से करा चुकी है और आगे बढ़ रही है। हिंदी का वैश्विक परिदृश्य बहुत व्यापक है और यही व्यापकता हिंदी की लोकप्रियता का कारण है।

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डॉ. संध्या सिंह की चार कविताएं

नयापन ज़िंदगी है
बासी का अंत है
सुबह नई है
तो यह बासीपन क्यों
यह उदासी क्यों?

सवाल हैं
तो उत्तर भी होंगे ही
मिलें न मिलें

आइए ढूँढते हैं उन्हें
नये तौर से
नये तरीके से...

2)

हर शनिवार खड़ी होती हूँ
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सिंगापुर में भारत

भारतीय नाम वाले महत्वपूर्ण रास्तों की कहानी

रास्ते जीवन के वे पहलू हैं जिनसे हमारा वास्ता पड़ता ही है। कभी हम सही रास्ते पर होते हैं तो कभी हम रास्ते को सही करने की कोशिश करते हैं। यह एक शब्द बड़े-बड़े अर्थ समेटे रहता है। बहुत गहराई में न जाते हुए अगर इसके शाब्दिक रूप को भी लिया जाए तो हर देश में, हर शहर में, हर गाँव में अलग-अलग रास्ते होते हैं जिनका एक नाम होता है। जी हाँ कोई भी सड़क या रास्ता बेनाम नहीं होता है। याद कीजिए भारत में रिक्शेवाले को तय करते समय पहला वाक्य होता है “फलां जगह चलोगे?” और अगर वह रास्ता नहीं जानता तो हम तुरंत बताने लगते हैं “पहले फलां रास्ते से चलो, फिर फलां रास्ते से मुड़ जाना......” और आज ‘गूगल बाबा’ भी तो यही कर रहे हैं तो यह तो तय हो गया कि रास्ता और उसके नाम की बड़ी भूमिका होती है। इसी विषय को केंद्र में रखते हुए और ज़्यादा गंभीर न होते हुए सिंगापुर के उन रास्तों का ज़िक्र होगा जिनके नाम या तो भारतीय हैं या अगर भारतीय नहीं हैं तो कुछ ख़ास कहानी है उस नाम के पीछे। हर रास्ता एक कहानी कहता है। 
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