देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।

महेन्द्र चन्द्र विनोद शर्मा | फीजी व न्यूज़ीलैंड

महेन्द्र चन्द्र विनोद शर्मा का जन्म 25 सितम्बर 1921 को फीजी के नदोकइका, नईतासीरी में हुआ था।1982 से 1987 तक आप फीजी के साप्ताहिक समाचार पत्र \'शान्ति दूत\' के सम्पादक रहे।  1987 में आप फीजी संसद में निर्वाचित हुए।

बाद में आप न्यूज़ीलैंड आ बसे।  आपको न्यूज़ीलैंड में मास्टर विनोद के नाम से जाना जाता था।  

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उज्ज्वल भविष्य

धनई और कन्हई लंगोटिया यार थे और पड़ोसी भी। ऐसा लगता था कि उनके दो शरीर थे परन्तु आत्मा एक ही थी। वे प्रण बांध कर हर दिन कम से कम चार घण्टे एक साथ बिताते थे। आज धनई के घर, कल कन्हई के। कभी-कभी दोनों एक ही थाली से भोजन भी करते थे। एकता दर्शाने के लिए वे अकसर एक ही रंग और एक ही ढंग के कपड़े भी धारण करते थे। एक साथ सूखी तम्बाकू, चना और सुपारी मिलाकर खाते और एक ही साथ यंगोना पीते। जब जोश में आते तब शराब की बोतल भी खाली कर देते थे। उन्हें विवाद करते कभी किसी ने नहीं सुना, झगड़ने का तो सवाल ही नहीं उठता था।

अक्टूबर, 1963 में धनई, उसकी पत्नी मनोरमा और तीनो पुत्रों (सतीश, अतीश और जगदीश) को अमेरिका का ग्रीन कार्ड मिल गया। धीरे-धीरे जाने की तैयारियां होने लगी। दोनों पड़ोसियों को बिछड़ने का दुःख होने लगा। जुदा होने की बात सरल नहीं थी। दोनों देर तक बातें करते रहते थे।

कन्हई ने क्लेश-भरे शब्दों में पूछा - "तो आप मुझे छोड़ कर चले जाएंगे। मैं अकेला कैसे अपना समय काटूंगा यार? जिन्दगी अधूरी रहेगी। किसके साथ सरौते से सुपारी काटूंगा?"

धनई-- "कन्हई भैया, तुम घबराते क्यों हो? मैं यमराज के घर थोड़े जा रहा है। मैं भी तो तुम्हारे बिना समय नहीं गुजार पाऊंगा। क्या करूं इन पुत्रों के भविष्य उज्ज्वल बनाने के लिए ही जा रहा हूँ। तम अमेरिका आना भाई, यही बहाने एक नया देश घूम लेना। मैं भी फीजी आऊंगा। दिल छोटा मत करो।"

दिसम्बर में धनई पूरे परिवार के साथ अमेरिका चला गया। वह हमेशा कन्हई के पास पत्र भेजा करता था, कन्हई बराबर जवाब देता रहता था। उधर से ‘मेकाडेमिया नट' आता रहता था और इधर से प्रति महीने पांच किलो ‘यांगोना' भेजा जाता था। दोनों ओर से दर्शन देने के निमंत्रण आते-जाते रहते थे।

पन्द्रह वर्ष बाद, 1978 में कन्हई के पुत्रों ने उन्हें तथा अपनी मां (कल्याणी) को अमेरिका भेजा। कन्हई और कल्याणी बहुत बडी आशाएं लेकर तमाम सौगात लिए ‘कोण्टस' वायुयान द्वारा लोस एंजलिस हवाई अड्डे पर उतरे। इमिग्रेशन और कस्टम्स के निरीक्षण के बाद जब वे बाहर पहुंचे तो धनई को अकेले ही फलों के हार लिए उत्सुकता से खड़े हुए देखा। मनोरमा वहां नहीं थी, सतीश, अतीश और जगदीश भी नहीं। अब तो तीनों बहुत बड़े हो चुके होंगे। कन्हई ने अपनी दष्टि चारों ओर दौडाई लेकिन उन्हें कोई नहीं दिखाई पड़ा। बड़ी निराशा हुई, अंखियाँ प्यासी ही रह गई। उन्होंने कल्याणी के कान में फुसफुसाया - "कुछ गड़बड़ है। धनई भाई अकेले आए है, हमें लेने।"

ट्रोलियाँ ठेलते हुए वे बाहर निकले। धनई ने दोनों को ‘ओर्किड' के हार पहनाए। जी भर के गले मिले। छओ आंखें बाढ़ से ग्रस्त हो गई। कल्याणी से रहा न गया। वह पूछ ही बैठी, "मनोरमा बहिनी क्यों नहीं आई, भइया?" बात काटते हुए धनई ने कहा, "कल्याणी बहन, हम पहले क्यों नहीं सामान ‘वेन' में लाद दे तब मैं आप को सम्पूर्ण कहानी बताऊं।"

सामान लद गए, तीनों अन्दर बैठे और ‘मेक्सिकन वेन ड्राइवर' आगे बढा। "हमें घर पहुंचते लगभग आधा घण्टा लगेगा।" धनई ने बताया। "तब तक मैं आप लोगों को पारिवारिक पवाडे सुनाता चलूँगा। सब से पहले मैं यह बताना चाहूंगा कि मैं ने आप लोगों से एक दुखद समाचार छिपा रखा था कि अब मनोरमा इस दुनिया में नहीं है।" धनई फूट कर रोने लगा। कन्हई और कल्याणी ने उसे सांत्वना दी।

धनई साहस इकट्ठा कर के फिर उन्हें बताने लगा-- "भइया, मनोरमा छह महीने पहले चली गई। सब खेल बुरी तरह बिगड़ चुका है। सतीश, अतीश एक धनी परिवार की लडकियों के साथ शादी कर के घर से निकल गए। जगदीश साथ में है परन्तु उसकी पत्नी, पवन ने उसका कान भर कर मुझे मेरे ही घर से निकलवा कर ‘गेराज' में रहने का प्रबंध करवाया है।" इतना बता कर वह फिर विलाप करने लगा।

वे घर पहुंच गए। ड्राइवर ने सामान उतरवा कर ‘गेराज' में रखवा दिया। फिर वह अपना किराया लेकर चला गया।

मनोरमा की अनुपस्थिति के कारण धनई का शरीर आधा गल चुका था। दैनिक कलह से वह बहुत तंग हो चुका था। जो लाडले पुत्र फीजी में एक आज्ञा पर ‘विक्टोरिया पर्वत' खोद कर बहा सकते थे, वे अमेरिका में उसी का गला दबाने लगे। एक-दो बार तो धनई को एक कमरे के अन्दर बन्द कर के रखा जा चुका था। वह चुप्पी साध कर सब कुछ सह लेता था। किससे शिकायत करता?

सामान ‘गेराज' में रख दिया गया तब छोटा पुत्र जगदीश, अपनी पत्नी पवन के साथ बाहर निकला। धनई ने परिचय कराया पर उस वक्त जगदीश जमीन की ओर और पवन आसमान की तरफ देख रहे थे। उन्हें उनसे मिलने में न प्रसन्नता हुई और न ही उन्होंने उसकी ज़रूरत समझी।

धनई ने बेटे से कहा-- "जगदीश, बहू से कहो कुछ चाय-पानी तैयार कर दे। याद है तुम्हें, जब तुम तीन साल के थे तब इन्हीं की गोद में पड़े रहते थे। इन्हीं के घर भोजन करते थे। ये हमारे पड़ोसी थे फीजी में।"

"रहे होंगे, तो मैं क्या करूं? चाय बनाना तो 'इम्पोसिबल' है।
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