देवनागरी ध्वनिशास्त्र की दृष्टि से अत्यंत वैज्ञानिक लिपि है। - रविशंकर शुक्ल।

गयाप्रसाद शुक्ल सनेही

'जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रसधार नहीं,
वह ह्रदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।'

उपरोक्त पंक्तियों के रचयिता गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' का जन्म श्रावण शुक्ल 13, संवत्‌ 1940 वि. तदनुसार 21 अगस्त, 1883 को हड़हा ग्राम, उन्नाव में हुआ था। आपके पिता का नाम पं० अवसेरीलाल शुक्ल व माता का नाम श्रीमती रुक्मिणी देवी था। आप जब केवल पाँच वर्ष के बालक थे कि आपके पिता का साया आपके सिर से उठ गया।

1899 में सनेहीजी अपने गांव से आठ मील दूर बरहर नामक गांव के प्राइमरी स्कूल के अध्यापक नियुक्त हुए। 1921 में टाउन स्कूल की हेडमास्टरी से त्यागपत्र दे दिया और शिक्षण-कार्य की सरकारी नौकरी से मुक्ति पा ली। यह गांधीजी के आंदोलन का प्रभाव था जिससे प्रेरित और प्रभावित होकर सनेहीजी ने त्यागपत्र दिया था। इसी वर्ष उपन्यास सम्राठ प्रेमचंद ने भी त्यागपत्र दे दिया था।

आरंभ में सनेहीजी ब्रजभाषा में ही लिखते थे और रीति-परंपरा का अनुकरण करते थे। उस ज़माने की प्रसिद्ध काव्य-पत्रिकाओं में सनेहीजी की रचनाएं रसिक-रहस्य, साहित्य-सरोवर, रसिक-मित्र इत्यादि में छपने लगी थीं।

सनेहीजी द्वारा रचित प्रमुख कृतियां हैं - प्रेमपचीसी, गप्पाष्टक, कुसुमांजलि, कृषक-क्रन्दन, त्रिशूल तरंग, राष्ट्रीय मंत्र, संजीवनी, राष्ट्रीय वीणा (द्वितीय भाग), कलामे-त्रिशूल, करुणा-कादम्बिनी और सनेही रचनावली।

सनेहीजी का 20 मई 1972 को निधन होगया।

 

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दिन अच्छे आने वाले हैं

जब दुख पर दुख हों झेल रहे, बैरी हों पापड़ बेल रहे,
हों दिन ज्यों-त्यों कर ढेल रहे, बाकी न किसी से मेल रहे,
तो अपने जी में यह समझो,
दिन अच्छे आने वाले हैं ।

जब पड़ा विपद का डेरा हो, दुर्घटनाओं ने घेरा हो,
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हम स्वेदश के प्राण

प्रिय स्वदेश है प्राण हमारा,
हम स्वदेश के प्राण।

आँखों में प्रतिपल रहता है,
ह्रदयों में अविचल रहता है
यह है सबल, सबल हैं हम भी
इसके बल से बल रहता है,

और सबल इसको करना है,
करके नव निर्माण।
हम स्वदेश के प्राण।
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सुभाषचन्द्र

तूफान जुल्मों जब्र का सर से गुज़र लिया
कि शक्ति-भक्ति और अमरता का बर लिया ।
खादिम लिया न साथ कोई हमसफर लिया,
परवा न की किसी की हथेली पर सर लिया ।
आया न फिर क़फ़स में चमन से निकल गया ।
दिल में वतन बसा के वतन से निकल गया ।।

बाहर निकल के देश के घर-घर में बस गया;
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सदुपदेश | दोहे

बात सँभारे बोलिए, समुझि सुठाँव-कुठाँव ।
वातै हाथी पाइए, वातै हाथा-पाँव ॥१॥

निकले फिर पलटत नहीं, रहते अन्त पर्यन्त ।
सत्पुरुषों के वर-वचन, गजराजों के दन्त ।।२।।

सेवा किये कृतघ्न की, जात सबै मिलि धूल ।।
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हिन्दी

अच्छी हिन्दी ! प्यारी हिन्दी !
हम तुझ पर बलिहारी ! हिन्दी !!

सुन्दर स्वच्छ सँवारी हिन्दी ।
सरल सुबोध सुधारी हिन्दी ।
हिन्दी की हितकारी हिन्दी ।
जीवन-ज्योति हमारी हिन्दी ।
अच्छी हिन्दी ! प्यारी हिन्दी !
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हैं खाने को कौन

कुछ को मोहन भोग बैठ कर हो खाने को 
कुछ सोयें अधपेट तरस दाने-दाने को
कुछ तो लें अवतार स्वर्ग का सुख पाने को 
कुछ आयें बस नरक भोग कर मर जाने को 
श्रम किसका है, मगर कौन हैं मौज उड़ाते 
हैं खाने को कौन, कौन उपजा कर लाते?

- त्रिशूल [पं. गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही']
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स्वदेश

वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।

जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं॥
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुँच सकेगा पार नहीं।
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