हरिवंश राय बच्चन साहित्य Hindi Literature Collections

कुल रचनाएँ: 20

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चिड़िया का घर | बाल-कविता

चिड़िया, ओ चिड़िया,
कहाँ है तेरा घर?
उड़-उड़ आती है

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जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया

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मधुशाला | Madhushala

मृदु भावों के अंगूरों की
आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से

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जीवन की आपाधापी में

जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला
कुछ देर कहीं पर बैठ कभी यह सोच सकूँ
जो किया, कहा, माना उसमें क्या बुरा भला।

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हरिवंशराय बच्चन की नये वर्ष पर कविताएं

यहाँ हरिवंशराय बच्चन की नये वर्ष पर लिखी गई कुछ कविताएं संकलित की हैं। विश्वास है पाठकों को अच्छी लगेंगी।

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साथी, नया वर्ष आया है!

साथी, नया वर्ष आया है!
वर्ष पुराना, ले, अब जाता,
कुछ प्रसन्न सा, कुछ पछताता,

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नव वर्ष

नव वर्ष
हर्ष नव
जीवन उत्कर्ष नव।

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फ़ादर बुल्के तुम्हें प्रणाम

फ़ादर बुल्के तुम्हें प्रणाम!
जन्मे और पले योरुप में
पर तुमको प्रिय भारत धाम

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चुन्नी-मुन्नी

मुन्नी और चुन्नी में लाग-डाट रहती है । मुन्नी छह बर्ष की है, चुन्नी पाँच की । दोनों सगी बहनें हैं । जैसी धोती मुन्नी को आये, वैसी ही चन्नी को । जैसा गहना मुन्...

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मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिय तुम आते तब क्या होता?

मौन रात इस भांति कि जैसे, कोई गत वीणा पर बज कर,
अभी-अभी सोई खोई-सी, सपनों में तारों पर सिर धर
और दिशाओं से प्रतिध्वनियाँ, जाग्रत सुधियों-सी आती हैं,

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दिन जल्दी-जल्दी ढलता है

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंज़िल भी तो है दूर नहीं -
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!

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एक और जंजीर तड़कती है, भारत मां की जय बोलो

इन जंजीरों की चर्चा में कितनों ने निज हाथ बँधाए,
कितनों ने इनको छूने के कारण कारागार बसाए,
इन्हें पकड़ने में कितनों ने लाठी खाई, कोड़े ओड़े,

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मरण काले

निराला के देहांत के पश्चात् उनके मृत शरीर का चित्र देखने पर हरिवंशराय बच्चन की लिखी कविता -
मरा
मैंने गरुड़ देखा,

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साथी, घर-घर आज दिवाली!

साथी, घर-घर आज दिवाली!
फैल गयी दीपों की माला
मंदिर-मंदिर में उजियाला,

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दो बजनिए | कविता

"हमारी तो कभी शादी ही न हुई,
न कभी बारात सजी,
न कभी दूल्‍हन आई,

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आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ

आज फिर से तुम बुझा दीपक जलाओ
है कहाँ वह आग जो मुझको जलाए,
है कहाँ वह ज्वाल मेरे पास आए,

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स्वतंत्रता दिवस

आज से आजाद अपना देश फिर से!
ध्यान बापू का प्रथम मैंने किया है,
क्योंकि मुर्दों में उन्होंने भर दिया है

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नव वर्ष

नव वर्ष
हर्ष नव
जीवन उत्कर्ष नव

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दीपक जलाना कब मना है

स्वर्ग के दुष्प्राप्य रंगों से, रसों से जो सना था
ढह गया वह तो जुटाकर ईंट, पत्थर, कंकड़ों, को
एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब मना है

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कुछ कर न सका 

मैं जीवन में कुछ कर न सका 
जग में अंधियारा छाया था, 
मैं ज्वाला ले कर आया था, 

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हरिवंश राय बच्चन का जीवन परिचय