लगभग साल भर बाद घर जा रहा हूँ। एक अज्ञात भय की कंपकंपी मेरे मन को छू-छू जाती है...कैसा दिखेगा घर? कैसे दिखेंगे कमरे? शाम होने को है। मैं गाँव के पास पहुँच गया ह...
छोड़ जाऊँगा कुछ कविता, कुछ कहानियाँ, कुछ विचार जिनमें होंगे
बनाया है मैंने ये घर धीरे धीरे खुले मेरे ख़्वाबों के पर धीरे धीरे किसी को गिराया न ख़ुद को उछाला
चेहरे पर न भंगिमाएँ हैं वाणी में न अदा है कोई आँखें भी तो खुली खुली हैं