जीवन का ये जो राग है निर्मल है, ये बेदाग़ है, तुम छेड़ो न इस राग को
स्वदेस में बिहारी हूँ, परदेस में बाहरी हूँ जाति, धर्म, परंपरा के बोझ तले दबी एक बेचारी हूँ। रंग-रूप,नैन-नक्श, बोल-चाल, रहन-सहन
तू आप ही अपना शत्रु है तू आप ही अपना मित्र, या रख जीवन काग़ज़ कोरा
माँ अमर होती है, माँ मरा नहीं करती। माँ जीवित रखती है
वृत्त में क़ैद गोल गोल घूमती धुरी सी माँ
अवधपुरी से जनकपुरी तक प्रेम की गंगा बहाते हैं वो राम राम कहलाते हैं।