मैया का आया
वृद्धाश्रम से खत
कैसे हो बेटा
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बहुत बुरों के बीच से, करना पड़ा चुनाव ।
अच्छे लोगों का हुआ, इतना अधिक अभाव ।।
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साई इतना दीजिए, जामे कुटुम समाय ।
मैं भी भूखा ना रहूँ साधु न भूखा जाय ॥
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दीन दुखी मज़दूरों को लेकर था जिस वक्त जहाज सिधारा
चीख पड़े नर नारी, लगी बहने नयनों से विदा-जल-धारा
भारत देश रहा छूट अब मिलेगा इन्हें कहीं और सहारा
फीजी में आये तो बोल उठे सब आज से है यह देश हमारा
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लेखनी में रक्त की भर सुर्ख स्याही
काल-पथ पर भी सृजन के हम सिपाही,
तप्त अधरों पर मिलन की प्यास लिखते हैं
हम धरा की देह पर आकाश लिखते हैं
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दुनिया भर की सारी धार्मिक किताबों ने,
एक सामूहिक अपील जारी की है…
कि हम आपकी श्रद्धा और सम्मान के लिए
हृदय से आभारी हैं…
लेकिन काश आप हमें पूजने की बजाय
पढ़ लेते!
पढ़ने के साथ-साथ समझ लेते…
समझने के साथ-साथ
अपने जीवन में उतार लेते…
अंत में बड़ी याचना से लिखा है…
हमें हमारा स्वाभाविक परिवेश लौटायें
हमें पूजाघरों से मुक्ति दिलाएं!!!
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माँ अमर होती है,
माँ मरा नहीं करती।
माँ जीवित रखती है
पीढ़ी दर पीढ़ी
परिवार, परंपरा, प्रेम और
पारस्परिकता के उस भाव को
जो समाज को गतिशील रखता है
उससे पहिए को खींच निकालता है
परिस्थिति की दलदल से बाहर।
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व्यंग्य कोई कांटा नहीं-
फूल के चुभो दूं ,
कलम कोई नश्तर नहीं-
खून में डूबो दूं
दिल कोई कागज नहीं-
लिखूं और फाडूं
साहित्य कोई घरौंदा नहीं-
खेलूं और बिगाडूं !
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ऐसे कुछ और सवालों को उछाला जाये
किस तरह शूल को शूलों से निकाला जाये
फिर चिराग़ों को सलीक़े से जलाना होगा
तम है जिस छोर, उसी ओर उजाला जाये
ये ज़रूरी है कि ख़यालों पे जमी काई हटे
फिर से तहज़ीब के दरिया को खँगाला जाये
फावड़े और कुदालें भी तो ढल सकती हैं
अब न इस्पात से ख़ंज़र कोई ढाला जाये
-राजगोपाल सिंह
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धरती मैया जैसी माँ
सच पुरवैया जैसी माँ
पापा चरखी की डोरी
इक कनकैया जैसी माँ
तूफ़ानों में लगती है
सबको नैया जैसी माँ
बाज़ सरीखे सब नाते
इक गौरैया जैसी माँ
-राजगोपाल सिंह
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मोल करेगा क्या तू मेरा?
मिट्टी का मैं बना खिलौना;
मुझे देख तू खुशमत होना ।
कुछ क्षण हाथों का मेहमां हूं, होगा फिर मिट्टी में डेरा ।
मोल करेगा क्या तू मेरा ?
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हम मजदूरों को गाँव हमारे भेज दो सरकार
सुना पड़ा घर द्वार
मजबूरी में हम सब मजदूरी करते हैं
घरबार छोड़ करके शहारों में भटकते हैं
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स्वर के सागर की बस लहर ली है
और अनुभूति को वाणी दी है
मुझ से तू गीत माँगता है क्यों
मैं ने दुकान क्या कोई की है
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चुप क्यों न रहूँ हाल सुनाऊँ कहाँ कहाँ
जा जा के चोट अपनी दिखाऊँ कहाँ कहाँ
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प्रिय तुम्हारी याद में यह दर्द का अभिसार कैसा,
आँसुओं के हार से ही प्रीत का सम्मान कैसा!
प्रेम का प्रतिदान कैसा!
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जाने कब की देखा-देखी, धीरे-धीरे प्यार बन गई
लहर-लहर में चाँद हँसा तो लहर-लहर गलहार बन गई
स्वप्न संजोती सी वे आँखें, कुछ बोलीं, कुछ बोल न पायीं
मन-मधुकर की कोमल पाखें, कुछ खोली, कुछ खोल न पायीं
एक दिवस मुसकान-दूत जब प्रणय पत्रिका लेकर आया
ज्ञात नहीं, तब उस क्षण मैंने, क्या-क्या खोया, क्या-क्या पाया
क्षण भर की मुसकान तुम्हारी, जीवन का आधार बन गई।
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सभी को इस ज़माने में सभी हासिल नहीं मिलता
नदी की हर लहर को तो सदा साहिल नहीं मिलता
ये दिलवालो की दुनिया है अजब है दास्तां इसकी
कोई दिल से नहीं मिलता, किसी से दिल नहीं मिलता
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बाबा, मन की आँखें खोल!
दुनिया क्या है खेल-तमाशा,
चार दिनों की झूठी आशा,
पल में तोला, पल में माशा,
ज्ञान-तराजू लेके हाथ में---
तोल सके तो तोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!
झूठे हैं सब दुनियावाले,
तन के उजले मनके काले,
इनसे अपना आप बचा ले,
रीत कहाँ की प्रीत कहाँ की---
कैसा प्रेम-किलोल। बाबा, मनकी आँखें खोल!
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इश्क और वो इश्क की जांबाज़ियाँ
हुस्न और ये हुस्न की दम साज़ियाँ
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मेरे हिस्से का आसमान
कुछ ज्यादा ही ऊँचा हो गया है,
और मैं बावरी बार-बार
उस ऊँचाई तक पहुँचने में
अपनी सारी ताकत लगा देती हूँ।
नहीं आ पाता आसमान का वह टुकड़ा
मेरे हाथ,
मालूम चला है
वह पहले से ही झपट लिया गया है,
अवसरवादियों और खुशामदियों के द्वारा
और अब मैंने आसमान की बुलंदियों को छोड़
अपनी जमीन पर ही बने रहने का फैसला ले लिया है।
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ज़िन्दगी को औरों की ख़ातिर बना दिया
घर की ज़रूरतों ने मुसाफ़िर बना दिया
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यूँ कहने को बहकता जा रहा हूँ
मगर सच में सँभलता जा रहा हूँ
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