कोई कौम अपनी जबान के बगैर अच्छी तालीम नहीं हासिल कर सकती। - सैयद अमीर अली 'मीर'।

विस्मृतियों के दौर में अमिट | संस्मरण

विस्मृतियों के दौर में अमिट

सिंगापुर में अध्ययन-अध्यापन करते अब एक लंबा समय बीत गया है, युवा पीढ़ी को भाषा सिखाने का काम जो करती हूँ, इसलिए भाषा सिखाने के बहाने भविष्य को देखने और उनको तनिक निकट से जानने का अवसर मुझे मिला और मिलता रहता है। न जाने कितनी ही ऐसी छोटी बड़ी कहानियाँ, घटनाएँ घटती गईं, या कहूँ जुड़ती गईं कि उनका लेखा-जोखा मस्तिष्क के किसी एक कोने में अपने आप सहेजता चला गया है। सिंगापुर में ज़्यादातर फ्लैट्स वाले घर की दुनिया से बाहर निकलकर जैसे ही आप विश्वविद्यालय के परिसर में कदम रखते हैं, अपने आप आपका व्यक्तित्व और  आप स्वयं एक बदलाव महसूस करते हैं; मैं इन बदलावों से कैसे अछूती रह सकती हूँ। मन में अंकित इन ढेर सारी यादों को किसी एक ख़ाके में रख पाना संभव नहीं क्योंकि इनकी प्रकृति एक दूसरे से बहुत भिन्न है। 

उम्र की सुई अपनी निरंतरता बनाए हुए बढ़ रही है। कभी-कभी लगता है कि विस्मृतियों का दौर कब पूर्णरूपेण दस्तक दे जाए, इस कभी शनैः कभी तीव्रता से आगमन करते दौर में भी कुछ स्मृतियाँ काग़ज़ पर आकार ले लें क्योंकि अब भी मेरी यादों के दायरे में वे अपना विशाल आकार लिए उपस्थित हैं और न जाने कब समय का यह दौर उन्हें विस्मृत कर दे! 

बात लगभग ग्यारह-बारह साल पहले की है, विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा सिखाते हुए एक लंबा समय बीत चुका था और कक्षाओं में दिलचस्पी और बढ़ने लगी थी। सभी भाषा कक्षाएँ बहुत अनोखी होती हैं क्योंकि यहाँ अलग-अलग परिवेश और पृष्ठभूमि वाले विद्यार्थी  भाषा सीखने आते हैं। उनके  सीखने के उद्देश्य अलग होते हैं, उन पहलुओं पर बात कभी और करना अधिक बेहतर होगा तो यहाँ बस उन यादों से  कुछ बातें। सत्र शुरू हुआ और हमेशा की तरह, नया ‘बैच’ आया, उनसे परिचय बढ़ने लगा। हिंदी भाषा की कक्षाओं में संख्या सीमित ही रहती है शायद इसलिए हर विद्यार्थी को बहुत नज़दीक से समझने का मौक़ा मिलता है। उस समय हिंदी के चार स्तर थे जबकि वर्तमान में छह स्तर हैं। जब हम भाषा सिखाते हैं तो उसे अलग-अलग स्तर में बाँटना होता है ताकि क्रमिक गति से भाषा सीखें| हमेशा सबसे अधिक विद्यार्थी  पहले  स्तर में ही आते हैं। 

हिंदी के पहले स्तर में आये विद्यार्थियों  में शामिल था एक विद्यार्थी  ‘जॉन’ (बदला हुआ नाम)| वह चीनी मूल का था। लंबा और दुबला-पतला जॉन मोटे चश्मे लगाता था। उसको देखते ही लगता कि एकदम पढ़ाकू विद्यार्थी  का प्रवेश हो गया है। चीनी लोगों के बाल बहुत रेशमी से होते हैं, जॉन के भी थे और उसने तनिक लम्बे भी रखे थे| कभी-कभी  ‘तेरे नाम’ फ़िल्म के सलमान खान वाली झलक मिल जाती थी, बस कद-काठी में अंतर था| कुछ तो ख़ास था उसमें| कक्षा में जॉन ने अपनी जगह बना ली थी| अपने छोटे-छोटे वाक्यांशों और  शब्दों के माध्यम से वह कक्षा को काफ़ी सजीव भी बनाए रखता। भाषा सीखने में उसकी अलग तरह की रुचि थी। तरह-तरह के सवाल पूछता रहता, जब तक उसकी जिज्ञासाएँ शांत न हो जाएँ। उस समय हम दो ही लोग हिंदी की कक्षाएँ लेते थे - मैं हिंदी भाषा के पहले स्तर के ‘लेक्चर’ लेती थी और ‘ट्यूटोरियल’ का काम देखते थे डॉ. भट्ट। ज़ाहिर है कि हम दोनों कई बार विद्यार्थियों  के विषय में बात करते रहते थे। दूसरों का तो शायद पता न चले लेकिन मुझे अपने विद्यार्थी  अपनी औलाद से भी ज़्यादा प्रिय हो जाते हैं; और तो और, मेरे बच्चे कई बार इसकी शिकायत भी करते हैं कि माँ आप हमसे ज़्यादा अपने विद्यार्थियों को कैसे प्रेम कर सकती हैं। खैर, डॉ. भट्ट और मेरे मध्य जॉन के विषय में बात होती थी कि उसमें सीखने का अलग जुनून है, वह बहुत मेहनत कर रहा है। विदेशी मूल के विद्यार्थी  जब बहुत अच्छा निष्पादन करते हैं तो यह बहुत दिलचस्प हो जाता है कि जिस काम के लिए हम यहाँ नियुक्त हैं उस कार्य का वास्तविक परिणाम हमें देखने को मिल रहा है। कक्षा एक वृक्ष की भांति ही तो है और जब तक उसकी टहनियों में पुष्प न खिल जाएँ, हमेशा चाहे जौहरी की तरह या बगुला ध्यान लगाए हम भी हर विद्यार्थी  के अध्ययन और विकास पर सहायक बनने को तैयार रहते हैं। 

बहरहाल, सत्र आगे बढ़ता गया| कक्षा की चहल-पहल के बीच जॉन की भाषा में दिलचस्पी के साथ ही दक्षता भी बढ़ती जा रही थी| स्मृतियों के ऊभ-चूभ में मुझे याद है जॉन  ने कक्षा के एक प्रोजेक्ट के लिए अपने परिवार के बारे में प्रस्तुति दी थी| उसकी प्रस्तुति ने सभी को आकर्षित किया क्योंकि जिस तरह से उसने शब्दों को बुना, लगा जैसे बीज अपने भीतर जीवन छिपाए रखता है और अंकुरित होने के लिए सही समय का इंतज़ार कर रहा  था| हमारे विश्वविद्यालय में सत्र कुल तेरह हफ़्तों का ही होता है| पलक झपकते ही समय की गति ने सत्र के अंत की ओर प्रवेश किया| भले ही कुछ लोग मानें कि परखने की यह कसौटी कम मुफ़ीद है पर  इस थोड़े समय में विद्यार्थियों के जीवन, उनकी सोच, एक नए संसार का  जितना विस्तृत  ज्ञान और समझ मुझे प्राप्त हो जाती, उतना किसी अन्य प्रयोजन से नहीं| ग्यारहवें-बारहवें हफ़्ते तक आते-आते जॉन में कुछ परिवर्तन हमें दिखाई देने लगे। 

विद्यार्थी ज़्यादातर सत्र के आखिरी हफ़्तों में  बेचैन दिखाई देते हैं क्योंकि बहुत सारे ‘सबमिशन’ एक साथ होते हैं लेकिन जॉन की बेचैनी अलग लग रही थी| धीरे-धीरे वह कुछ अधिक चुप रहने लगा और जब बोलता तो उसके बोलने का ढंग काफी बदला हुआ लगता। कभी-कभी चिड़चिड़ाया-बौखलाया भी दिखता, कभी इतना परेशान कि जैसे उसके परिवार में कुछ नोंक-झोंक ज़्यादा ही गंभीर हो। मुझे कई बार लगता था कि जॉन के अंतस में कोई द्वन्द्व चल रहा है जो हम समझ नहीं पा रहे हैं। क्या हमें उससे पूछना चाहिए या उससे बात करनी चाहिए! इस विषय पर मैंने डॉ. भट्ट से भी कहा। उन्हें भी इसका कुछ अंदाज़ा हो गया था। उनका आग्रह था कि वे ही उससे बात करेंगे कि यदि वह किसी तरह की परेशानी से गुज़र रहा है, शायद हम उसकी कुछ मदद कर सकें। मेरे बजाय डॉ. भट्ट से बात करना शायद उसके लिए अधिक सहज हो सकता था। 

जब हम एक ध्येय के साथ, एक जोश, एक जज़्बे के साथ किसी प्रयोजन से जुड़े हों तो यह मायने नहीं रखता कि कौन नेतृत्व कर रहा है बल्कि धुरी इस बात पर टिकी होती है कि सब सही हो। जॉन से बात करने का कोई अधिक लाभ नहीं हुआ क्योंकि उसने एक दीवार खींच ली थी और वह किसी को भी उसे पार करने नहीं देना चाहता था।  मैंने भी कई बार प्रयास किया किन्तु जॉन ने कभी कुछ भी ज़ाहिर नहीं किया जिससे उसके भीतर उठ रहे इतने बड़े तूफ़ान का तनिक भी अंदाज़ा लगाया जा सके। वह भीतर किसी अभाव में यदि डूबा भी हो, तो उसने बाहरी तौर पर भरा दिखने का नाटक किया। उसे अंदाज़ा हो गया था कि हम उसके लिए कुछ परेशान हैं; इसलिए  उसने अपनी दीवार को और भी मज़बूत कर लिया। हमें कुछ भी ठोस समझ नहीं आया और देखते-देखते सत्र का अंतिम हफ़्ता आ गया। 

सत्र के अंत में हम कक्षा के लिए गीत-संगीत और साथ भोजन आदि के लिए एक पार्टी आयोजित करते थे, उस बार यह ‘बारबेक्यू’ पार्टी थी। इस तरह का वातावरण शिक्षक-शिष्य से आगे हमें संस्कृति के धागे से परिवार के रूप में जोड़ता है। कहीं न कहीं सांस्कृतिक समझ की सामूहिक ज़िम्मेदारी इस रूप में उभरती है। उस ‘बारबेक्यू’ पार्टी में जॉन अपनी एक साथी (पंजाबी महिला) के साथ आया। उसने बताया कि वह कुछ समय इस महिला का किरायेदार रहा है, जिसका बेटा विकलांग है और जॉन कभी-कभी उसकी देखभाल में मदद भी करता है। हमें आश्चर्य हुआ कि जॉन के पिता का एक अच्छा घर होने के बावजूद वह किराये पर क्यों रहा था? हमारे बीच फिर चर्चा हुई कि ये महिला क्या जॉन की प्रेमिका है? पर उनकी उम्र का अन्तर और जॉन द्वारा कभी-कभी उस महिला के बच्चे की देखभाल का ज़िक्र आदि ने ज़्यादा कुछ हमें सोचने नहीं दिया। 

पार्टी में जॉन ने ‘बारबेक्यू’ में मदद तो की ही, साथ ही बड़ा रोचक सा आग का खेल भी दिखाया। उस दिन जॉन बहुत सक्रिय और खुश था। उसकी बढ़-चढ़कर ली गई भागीदारी ने उस युवा ऊर्जा के लिए हमारी सोच से सारी चिंताओं को धूल की तरह तो नहीं पर काफ़ी हद तक झाड़कर अलग कर दिया। लगा शायद उसे कोई लक्ष्य मिल गया है जिसने उसके सामने खुला आसमान ला दिया हो। चूँकि सत्र पूरा हो गया था इसलिए  बाद में विद्यार्थियों  से संपर्क भी ना के बराबर रह जाता था, तब आज की तरह ‘व्हाटसअप’ और ‘टेलिग्राम’ जैसे मंच जो न थे।  

अगला सत्र शुरू हुआ और जॉन ने भी दाख़िला लिया। जिन विद्यार्थियों  की विशेष रुचि होती है, वे ही हिंदी-2 या अन्य स्तर तक आगे भाषा सीखते हैं क्योंकि जैसे-जैसे स्तर बढ़ता है, भाषा से सम्बंधित कार्य भी अधिक समय और जुनून की माँग करते हैं। उस बार हिंदी-2 डॉ. भट्ट ले रहे थे, मेरा जॉन से अधिक सामना न हुआ। सत्र के कुछ हफ़्ते बीतते ही डॉ. भट्ट के मुँह से फिर उसी तरह जॉन के विषय में सुना। उस सत्र के प्रारंभ से ही, उसमें उसी तरह का चिड़चिड़ापन, घबराहट आदि दिखाई देते रहे। वे कहते कि कभी लगता है जैसे आधा सोया, आधा जगा है। जॉन में कुछ तो ऐसा था कि वह हमारी चर्चा का अक्सर केंद्र होता। कक्षा में शांत जॉन के भीतर बड़ी उथल–पुथल उसे किस यात्रा पर ले जा रही थी, जो कभी खो जाती हुई तो दिखाई पड़ती लेकिन कभी लड़ती हुई दिखाई क्यों नहीं देती थी। हम जॉन के जीवन को समझने का प्रयास तो तब  करते, जब वह कुछ साझा करता| तेरह हफ़्तों का वह सत्र भी पूर्णता की ओर बढ़ने लगा और हमें स्पष्ट लगने लगा था कि एक अत्यंत मेधावी विद्यार्थी  धीरे-धीरे पढ़ाई आदि की ओर ध्यान कम केन्द्रित कर पा रहा है, पर ऐसा नहीं है कि उसके अंक आदि कम आते थे। वह तब भी बहुत मेहनत करता था| हाँ, लगता जैसे जीवन की हरेक चीज़ बिखरी हुई है जिसे समेटने का प्रयास होना चाहिए| वह सत्र भी बीत गया। उस बार सत्र ख़त्म होते ही तीन-चार दिन के लिए मुझे अचानक भारत जाना पड़ा और हम कक्षा की पार्टी नहीं कर सके| 

जॉन हिंदी-3 में नहीं आया। कभी-कभी विद्यार्थी  अपनी अलग व्यस्तताओं के कारण अगले सत्र में आना चाहते हैं पर नहीं आ पाते, लेकिन उसके बाद भी ई-मेल या अन्य संदेश माध्यमों के ज़रिये वो हमसे जुड़े रहते हैं। जॉन ने ज़्यादा सन्देश नहीं भेजे। लेकिन हमें भीतर ही भीतर घुटता हुआ उसका चेहरा याद आता रहता। इस बीच बमुश्किल एक-आध बार ही उससे संपर्क हुआ हो। विद्यार्थियों  का नया बैच आता है तो हम कहीं न कहीं उन्हीं में लग जाते हैं| कुछ समय बीतने के बाद, एक साथ हम दोनों को जॉन का सन्देश फ़ेसबुक के माध्यम से प्राप्त हुआ जिसमें जॉन ने अपनी तस्वीर साझा की थी। पहली बार में तो विश्वास ही नहीं हुआ कि वही हमारा पढ़ाकू जॉन है, लेकिन फिर दिल पर दिमाग ने ज़ोर डाला और समझाया कि जॉन ही है। बस अंतर यही था कि जॉन अब जिनी (बदला हुआ नाम) बन गया था। हाँ, जिनी एक बहुत सुंदर, कमनीय युवती! पढ़ाने के दौरान भी कई बार हमें ऐसा महसूस होता था कि वो अंदर ही अंदर घुट रहा है| कुछ तो है, जिससे वह परेशान हो रहा है, घबराया हुआ है लेकिन इस तरह का सैलाब उसके भीतर उमड़ रहा था, इसका तनिक भी एहसास न था। कई बार निजता और एक सीमा का ध्यान रखते हुए बहुत सारी चीज़ें हम नहीं पूछ पाते| ऐसा ही कुछ शायद उस समय भी हुआ होगा। और मेरा ध्यान इस परिवर्तन की ओर तो बिलकुल भी नहीं गया था। क्या जन्मजात उसमें ऐसे शारीरिक विकास हुए थे या किसी संगत का असर था? 

प्रयास करने पर उसकी कहानी फ़ेसबुक तथा व्यक्तिगत टिप्पणियों के माध्यम से पता चली। आखिर उसने ये फ़ैसला क्यों लिया? असंतुष्टि, बहिष्कार ये शब्द ही भयानक हैं फिर चाहे जिस रूप में भी हों। वह अपने शरीर से असंतुष्ट था और जहाँ तक समझ आया, यही कारण था कि उसे ना तो कोई प्रेम करने वाला मिल रहा था और ना ही कोई उसकी तरफ ध्यान दे रहा था। वह मेधावी विद्यार्थी  था। पढ़ना-लिखना सब कुछ एक तरफ़ था लेकिन जो उस उम्र में एक आकर्षण होता है, एक दूसरे की ज़रूरत होती है, उस ज़रूरत की कमी उसे महसूस हो रही थी। वह कमी पूरी नहीं हो पा रही थी। इतने बड़े विश्वविद्यालय परिसर में कोई भी ऐसा साथी उसे नहीं मिल रहा था जो उसकी भावनाओं को समझ सके। उसे लगने लगा था कि लड़कियों को चाहने वाले अधिक होते हैं और लड़कों को प्रेम करनेवाली लड़कियाँ कम| उसके दिमाग में इस तरह की बातों ने ऐसा भँवर बनाया कि शायद धीरे-धीरे उसने ये कदम उठाया। 

उसके फ़ेसबुक दोस्तों की सूची देख हम दोनों हैरान थे क्योंकि वहाँ उसी की तरह के लोग थे। उसकी टिप्पणियों से यह तो स्पष्ट था कि अब इतने लोग उसे प्रेम करने वाले हैं। जब वह लड़का था तब तक कोई भी युवती उसकी तरफ नहीं देखती थी। उसने एक जगह यह भी लिखा “जैसे ही मैं एक युवती बना, पुरुषों की एक लंबी कतार है जो मुझसे बात करना चाहते हैं जो मेरे आसपास रहना चाहते हैं, मुझसे प्रेम करना चाहते हैं।”  उसकी टिप्पणियों से ही यह भी पता चला कि उसके पिता के साथ उसकी अकसर बहस होती रहती थी क्योंकि इस प्रक्रिया में लगने वाले खर्च को वे देना नहीं चाहते थे। जॉन संपन्न परिवार से था, उसे इस बात की बहुत अधिक चिढ़ रहती थी| उसने कई बार कक्षा में अपने पिता के प्रति आक्रोश व्यक्त भी किया था। अगर जॉन ‘जेंडर डिस्फ़ोरिया’ (ऐसी स्थिति, जिसमें व्यक्ति को लगता है कि उसका प्राकृतिक लिंग और उसकी लैंगिक पहचान में मेल नहीं है) की स्थिति से गुज़र रहा था, तो एक साल तक कक्षा के दौरान हमें कभी यह  क्यों नहीं लगा? पंजाबी महिला को तो हम उसकी प्रेमिका समझ रहे थे यानी उसके हाव-भाव, खयाल रखने का ढंग कुछ तो ऐसा रहा होगा? 

जॉन का इस तरह से परिवर्तित होना मेरे लिए बहुत बड़ी घटना थी। इसको अवशोषित करने में बौद्धिक के साथ ही भावनात्मक खुलेपन की अधिक ज़रूरत महसूस हुई तथा अपने विचारों की  रक्षा करते हुए अपनी सोच के दरवाज़े खुले रखने की भी मैंने पूरी कोशिश की। मैं एशियाई संस्कृति के साथ ही भारत के ऐसे परिवार से आती हूँ जहाँ इस तरह की चीज़ें अभी भी बहुत पर्दे में रखी जाती हैं। इस तरह से देखते-देखते जिस विद्यार्थी  को मैंने पढ़ाया और पूरे साल उसके हाव-भाव, व्यवहार में परिवर्तन होते तो देखा पर वह सब किसी परेशानी की ओर अधिक इंगित करते थे। यही लगता था कि उसकी घबराहट शायद पारिवारिक रिश्तों में किसी कड़वाहट के कारण हो। टूटे हुए परिवारों की कहानी विकसित देशों में काफ़ी है, हालाँकि जॉन की ‘मेरा घर-परिवार’ जैसे विषयों पर कक्षा प्रस्तुति आदि से यह तो स्पष्ट था कि वह आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध-संपन्न परिवार से था पर भौतिक सम्पन्नता आतंरिक शांति का पर्याय नहीं है। फिर यह भी कैसे भूलूँ कि जॉन खुद तो दूसरे के बच्चे का भी ख्याल रखता था किंतु उसका अपना परिवार उसे सहारा नहीं दे पाया। एक पल के लिए भी हमारे मन में यह नहीं आया कि वह स्त्री बनना चाहता था। उसके दिमाग में घर कर गया था कि अगर वह लड़की बन जाए, उसे प्यार करने वाले ज़्यादा लोग मिलेंगे, और उसे मिले भी। जॉन ने इतना बड़ा कदम एक दिन में नहीं उठाया होगा बल्कि इसे पीछे लंबा समय लगा होगा और उसके भीतर के सैलाब ने अपनी जीत पाई होगी। उसके लिए यह कोई आसान बात नहीं रही होगी और जिन प्रक्रियाओं से वह गुज़रा होगा, उसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। 

सच ही तो है कि हम धन सम्पत्ति अर्जित करते हैं आत्मीयता के विस्तार के लिए किंतु आधुनिकता के सारे साज़ो-सामान बेकार हैं, अगर कोई साथ न हो। क्या मित्र, दोस्त, सखा, साथी, सहेली, सखी जैसे शब्दों की चेतना को पुनः जीवित करने का समय है? क्या समाज में जागरूकता पैदा करने की यह चेतावनी है? मैं उन दिनों अपनी मानसिक स्थिति डगमगाते हुए पा रही थी। मैंने उसके बाद भी जॉन को एक बार और संदेश भेजा कि मैं उससे मिलना चाहती हूँ लेकिन उसका जवाब टालमटोल वाला था।  मैं जानना चाहती थी कि आखिर ऐसी कौन सी बातें हैं जो व्यक्ति को अपना लिंग परिवर्तित करवाने की ओर बढ़ा ले जाती हैं। बचपन से अगर उसमें ऐसी प्रवृत्ति रही होती, अलग बात थी लेकिन जॉन तो हमारे सामने अन्य लड़कों की तरह था। इस विचार ने मुझे इतना परेशान कर दिया कि उस दौरान मैं दो -ढाई बजे रात में उठकर अपने पति के साथ, क्योंकि उनको कुछ स्थानीय भाषाएँ भी आती हैं, उस क्षेत्र में जाती थी जहाँ किन्नर समाज रहता है, और उनमें से अधिकतर ने अपना लिंग परिवर्तित करवाया है| वे लोग रात में ही अधिक दिखाई पड़ते थे|   कई बार मैंने उन लोगों से बात करने की कोशिश की कि ऐसा क्या है कि जिससे उन्होंने अपनी पहचान परिवर्तित की? 

जॉन के उस परिवर्तन ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया था और मैं उस परिवर्तन को समझना चाहती थी। मैं किसी भी पूर्वाग्रह में बंधकर ऐसा कुछ नहीं कर रही थी, बल्कि समाज की इस सच्चाई को समझने का प्रयास कर रही थी। मैंने कई बार प्रयास किया, कुछ तो बात करने से साफ़ मना कर देते, कुछ से बात भी हुई, कुछ ठोस तो कुछ बहुत सतही जवाब मिले।  कुछ ने तो इस तरह का परिदृश्य उपस्थित किया कि इस हाशिए पर ठेल दिए गए जीवन से  इतनी सारी घटनाएँ, इतने सारे पहलू निकलकर आने लगे कि कई बार यह  भी लगने लगा कि जो हम समझते हैं, स्थितियाँ उससे बहुत भिन्न होती हैं। उस दौरान इतने किन्नरों से बात की कि एक आलेख भी लिखा ‘सिंगापुर का किन्नर समाज’ लेकिन आज तक उसे प्रकाशित करवाने की हिम्मत ही नहीं हो सकी। मेरे कम्प्यूटर में आज भी लेख कहीं पड़ा होगा क्योंकि उसमें कई ऐसी कड़वी कहानियाँ थीं जिन्हें मैंने शायद मानना ही नहीं चाहा कि सिंगापुर के परिवारों में इस तरह की उपेक्षाएँ हैं। शायद अपने खोखले गर्व से बाहर आने में समय लगता है| हम वाकई ख़ुशनसीब हैं जो अपनी विरासत को जानते हैं, हमें अपने रिश्तों की गहराई का भी अहसास है और कुछ लोग इसी गहराई को पाने के लिए अपने जीवन को किस कदर उलट देते हैं। 

इन शब्दों को लिखते-लिखते फिर यही सोच रही हूँ कि जॉन से जिनी बनने वाला वह एक इंसान नहीं रहा होगा, ऐसे तमाम विद्यार्थी  हैं जो शायद इसी उहापोह या जद्दोजहद में पड़े हों। क्या कुंभकर्णी नींद से हम जाग पाएँगे? क्या उनको सुनने वाला कोई है? मैंने और डॉ. भट्ट ने तो जॉन से कितनी बार बात करने की कोशिश की पर कामयाब न हो पाए। युवा पुंज को सही साथी, मित्र, दोस्त की कितनी आवश्यकता है, क्या इस ओर हम कोई प्रयास करेंगे? उनके जीवन में क्या चल रहा है, क्या कभी समझ पाएँगे? पड़ताल की जाए, कई कहानियाँ उभर कर सामने आएँगी और शायद समाज में वह स्थिति बने कि किसी जॉन को जिनी ना बनना पड़े, उसे प्यार, दोस्ती, रिश्ता, सम्मान और वह परिवेश मिले। आदमी को अधिक से अधिक भौतिक वस्तुओं की चाह तो है, पर लगातार संवेदनाहीन होते जाना समाज के लिए कितना घातक है, यह समझ आ जाए ताकि ऐसा माहौल बने जिसमें किसी भी देश के कर्णधार सही दिशा और नेतृत्व की क्षमता को बढ़ाएँ, क्या ऐसी कोशिश हो पाएगी?

-डॉ. संध्या सिंह, सिंगापुर 

संपर्क ई-मेल : sandhyasingh077@gmail.com 

*वाराणसी, भारत में जन्मीं डॉ. संध्या सिंह  ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। वर्तमान में, वे नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ़ सिंगापुर में हिंदी और तमिल भाषा विभाग की प्रमुख हैं। वे सिंगापुर की हिंदी संस्था संगम सिंगापुर की अध्यक्ष और हिंदी पत्रिका सिंगापुर संगम की संपादक भी हैं। वे हिंदी सोसाइटी सिंगापुर की प्रबंधन समिति में हैं|  उन्होंने सिंगापुर के  विश्वविद्यालयों व शैक्षणिक संस्थानों के लिए हिंदी पाठ्यक्रम निर्माण और विभिन्न संस्थाओं से जुड़ी गतिविधियों के आयोजन  में सक्रिय भूमिका निभाई है। वे सिंगापुर के विभिन्न मंत्रालयों के लिए हिंदी से सम्बंधित कार्यों में सक्रिय हैं| वे भारत और सिंगापुर के कई महत्वपूर्ण संस्थाओं के परामर्श  मंडल का हिस्सा हैं| विभिन्न लेखों के साथ ही उनके सात प्रमुख प्रकाशन हैं, जिनमें हिंदी सीखने के लिए ‘एन इंट्रोडक्शन टू हिंदी’ (एलीमेंट्री और एडवांस लेवल), केन्द्रीय हिंदी संस्थान से प्रकाशित सिंगापुर में भारत (विशेष संदर्भ: उत्तर भारत) शामिल हैं। वाणी प्रकाशन से सिंहापुरा: प्रवासी कविता, सिंहापुरा; प्रवासी गद्य, वैश्विक गाँव, प्रवासी पाँव के साथ ही  उन्होंने ‘सिंगापुर की चयनित रचनाएँ’ का संपादन भी किया है। उन्हें १२वें विश्व हिंदी सम्मलेन के दौरान प्रतिष्ठित विश्व हिंदी सम्मान (फीजी 2023, भारत सरकार) के साथ ही  प्रवासी साहित्य सम्मान, हिंदी गौरव सम्मान, हिंदी सेवी सम्मान और हिंदी शिक्षण सम्मान जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान प्राप्त हुए हैं। 

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