जब से हमने अपनी भाषा का समादर करना छोड़ा तभी से हमारा अपमान और अवनति होने लगी। - (राजा) राधिकारमण प्रसाद सिंह।

तुम मेरी बेघरी पे...

रचनाकार: ज्ञानप्रकाश विवेक | Gyanprakash Vivek
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तुम मेरी बेघरी पे बड़ा काम कर गए | Ghazal by Gyan Prakash Vivek

तुम मेरी बेघरी पे बड़ा काम कर गए
कागज का शामियाना हथेली पर धर गए

बोगी में रह गया हूं अकेला मैं दोस्तो!
एक एक करके सारे मुसाफिर उतर गए

गरमी में खोलते थे जो पानी की गुमटियां
तिश्नालबो! वो लोग न जाने किधर गए

यारो, सियासी शहर की इतनी-सी बात है
नकली मुकुट लगा के सभी बन-संवर गए

अक्वेरियम में डाल दीं जब मछलियां तमाम
तो यूं लगा कि सारे समंदर ठहर गए

-ज्ञानप्रकाश विवेक

 

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