देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

तुझे पाती हूं तो जी जाती हूं

बादल ही क्यों ना फट जाएँ
तेरे पीछे मे रोती भी नहीं
मेरे आंसुओं को भी
तेरी ही
उँगलियों से पुंछने की आदत है।

तुझे पाकर ही छलकता है भरा मन
तुझे पाकर ही टूटता है बाँध
तुझे पाकर ही लौटती है होंठों पर गुनगुनाहट
तुझे पाकर ही खिलती है
उजली धूप से मुस्कान।

तुझसे ही प्राण पाती हैं
मेरी संवेदनाएं
तुझसे ही जागती है मेरी चेतना
तुझे पा लेती हूँ
तो जी जाती हूँ।

-प्रीता व्यास
 न्यूज़ीलैंड

 

प्रतिक्रियाएं (Comments) - 0

अभी तक कोई टिप्पणी नहीं है। पहली टिप्पणी आप करें!

टिप्पणी लिखें (Write a Comment)

CAPTCHA

मेरी पसंदीदा रचनाएँ

आपने अभी तक कोई रचना सहेज कर नहीं रखी है।