भय ही पराधीनता है, निर्भयता ही स्वराज्य है। - प्रेमचंद।

तोड़ो

तोड़ो | रघुवीर सहाय की कविताएँ | Poem by Raghuvir Sahai

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये पत्थर ये चट्टानें
ये झूठे बंधन टूटें
तो धरती को हम जानें
सुनते हैं मिट्टी में रस है जिससे उगती दूब है
अपने मन के मैदानों पर व्यापी कैसी ऊब है
आधे आधे गाने

तोड़ो तोड़ो तोड़ो
ये ऊसर बंजर तोड़ो
ये चरती परती तोड़ो
सब खेत बनाकर छोड़ो
मिट्टी में रस होगा ही जब वह पोसेगी बीज को
हम इसको क्या कर डालें इस अपने मन की खीज को?
गोड़ो गोड़ो गोड़ो

- रघुवीर सहाय
[साभार - हँसो हँसो जल्दी हँसो]

 

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