राष्ट्रभाषा के बिना आजादी बेकार है। - अवनींद्रकुमार विद्यालंकार

रंगीन पतंगें

रंगीन पतंगें | Hindi poem by Abbas Raza Alvi

अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे

कुछ सजी हुई सी मेलों में
कुछ टँगी हुई बाज़ारों में
कुछ फँसी हुई सी तारों में
कुछ उलझी नीम की डालों में
कुछ कटी हुई कुछ लुटी हुई
पर थीं सब अपनी गाँवों में
अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे

था शौक मुझे जो उड़ने का
आकाश को जा छू लेने का
सारी दुनिया में फिरने का
हर काम नया कर लेने का
अपने आँगन में उड़ने का
ऊपर से सबको दिखने का
कैसी अच्छी लगती थीं बेफिक्र उमंगें
अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे

अब बसने नए नगर आया
सब रिश्ते नाते तोड़ आया
उड़ने की अपनी चाहत में
लगता है मैं कुछ खो आया
दिल कहता है मैं उड़ जाऊं
बनकर फिर से रंगीन पतंग
कटना है तो फिर कट जाओ
बनकर फिर से रंगीन पतंग
लुटना है तो फिर लुट जाऊं
बनकर फिर से रंगीन पतंग
फटना है तो फिर फट जाऊं
बनकर फिर से रंगीन पतंग
मैं गिरूं उसी ही आंगन में
और मिलूं उसी ही मिट्टी में
जिसमें सपनों को देखा था
जिसमें अपनों को खोया था
जिसमें मैं खेला करता था
जिसमें मैं दौड़ा करता था
जिसमें मैं गाया करता था सुरदार तरंगें
जिसमें मुझे दिखती थी वो रंगीन पतंगे

काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे
अच्छी लगती थी वो सब रंगीन पतंगे
काली नीली पीली भूरी लाल पतंगे

-अब्बास रज़ा अल्वी

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