देशभाषा की उन्नति से ही देशोन्नति होती है। - सुधाकर द्विवेदी।

रैदास के पद

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभु जी, तुम चंदन हम पानी, जाकी अँग-अँग बास समानी॥
प्रभु जी, तुम घन बन हम मोरा, जैसे चितवत चंद चकोरा॥
प्रभु जी, तुम दीपक हम बाती, जाकी जोति बरै दिन राती॥
प्रभु जी, तुम मोती, हम धागा जैसे सोनहिं मिलत सोहागा॥
प्रभु जी, तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै 'रैदासा'॥

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प्रतिक्रियाएं (Comments) - 2

S
Surender Pal Bhatia Nastic(SPBN) spbn67g@gmail.com
02-Oct-2015 14:32
शब्दस ऑफ़ जगत गुरु रविदास जी
v
vikram sahu nkvikram@yahoo.in
11-Oct-2013 12:10
ऐसे महान भक्त भारतीय साहित्य में अनुपम हैं. .......... बारम्बार नमन हमारा .................

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